राजस्थान की चित्रकला शैलियां: उपशैलियां, चित्रकार और तथ्य
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राजस्थानी चित्रकला के संपूर्ण नोट्स: चार शैलियाँ और उनकी उपशैलियाँ, प्रसिद्ध चित्रकार तथा आश्रयदाता और लोक चित्रकला परंपराएँ।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

राजस्थानी चित्रकला, जिसे राजपूत चित्रकला भी कहा जाता है, वह लघुचित्र परंपरा है जो लगभग सोलहवीं शताब्दी से राजपूत रियासतों के दरबारों में विकसित हुई। इसने जैन ताड़पत्र तथा कागज की पांडुलिपियों की पुरानी पश्चिमी भारतीय शैली से प्रेरणा ली, मुगल कारखानों से जो चाहा वह ग्रहण किया, और फिर अपनी राह बनाई: चटक सपाट रंग, स्पष्ट रेखांकन, प्रकृति और पशुओं से लगाव, तथा केवल दरबारी वृत्तांतों के बजाय भक्ति काव्य से लिए गए विषय। राजस्थान की परीक्षा के लिए यह अध्याय लगभग पूरी तरह मिलान का है, क्योंकि प्रश्न यही पूछते हैं कि कोई चित्र किस शैली का है, उसका आश्रयदाता कौन था और किस चित्रकार ने उसे प्रसिद्ध किया।
चार प्रमुख शैलियाँ
विद्वान अनेक दरबारी शैलियों को चार वर्गों में रखते हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी उपशैलियाँ हैं।
| शैली | उपशैलियाँ | विशेषता |
|---|---|---|
| मेवाड़ | चावंड, उदयपुर, नाथद्वारा, देवगढ़, शाहपुरा | सबसे प्राचीन शैली; गहरे लाल और पीले रंग, घटनाओं से भरे दृश्य |
| मारवाड़ | जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर, जैसलमेर, अजमेर | ऊँट और घोड़े, मरुस्थलीय परिवेश, किशनगढ़ का मुखाकृति सौंदर्य |
| हाड़ौती | बूँदी, कोटा, झालावाड़ | बूँदी में सघन वनस्पति और जल, कोटा में शिकार दृश्य |
| ढूँढाड़ | आमेर तथा जयपुर, अलवर, शेखावाटी, उनियारा | बड़े औपचारिक चित्र, स्वर्ण का उदार प्रयोग, भित्ति चित्रण |
मेवाड़ और उसकी उपशैलियाँ
मेवाड़ शैली चारों में सबसे प्राचीन है। इसकी पहली निश्चित तिथि वाली कृति रागमाला चित्रों का वह समूह है जो महाराणा अमर सिंह प्रथम के शासनकाल में 1605 में चावंड में चित्रकार निसारदीन ने बनाया था। यह शैली उदयपुर में महाराणा जगत सिंह प्रथम के समय अपने शिखर पर पहुँची, जिन्होंने महल में चित्रकला का कारखाना चलाया, और उस कारखाने के प्रमुख साहिबदीन थे, जिनकी सचित्र रामायण, भागवत पुराण तथा रसिकप्रिया मेवाड़ की सर्वाधिक प्रसिद्ध पांडुलिपियाँ हैं। मेवाड़ चित्रकला में लाल या पीली पृष्ठभूमि, बड़ी आँखों तथा छोटे कद वाली आकृतियाँ और घटनाओं से भरे दृश्य प्रिय हैं।
नाथद्वारा तब अपनी अलग उपशैली बना जब श्रीनाथजी का विग्रह वृंदावन से लाकर 1672 में वहाँ प्रतिष्ठित किया गया। इसकी विशेषता पिछवाई है, अर्थात देव विग्रह के पीछे लगाया जाने वाला बड़ा कपड़े का चित्र, जो ऋतु या पर्व के अनुसार बदला जाता है और जिसमें गाय, मोर, कमल, कदंब वृक्ष तथा कृष्ण लीला के दृश्य भरे रहते हैं। मेवाड़ का ठिकाना देवगढ़ भी बागता और चोखा जैसे चित्रकारों के साथ अपनी ओजपूर्ण शैली के लिए जाना जाता है।
मारवाड़: जोधपुर, बीकानेर और किशनगढ़
जोधपुर शैली में ऊँट, घोड़े, आम के वृक्ष और ऊँची पगड़ियाँ प्रिय हैं, और ऊँट पर सवार प्रेमी युगल ढोला-मारू की कथा इसका पहचान चिह्न है। बीकानेर चित्रकला राजस्थानी शैलियों में मुगल प्रभाव से सर्वाधिक प्रभावित है, जिसे रुकनुद्दीन तथा अली रजा जैसे परिवारों ने सँवारा, और बीकानेर ही उस्ता कला का घर है, अर्थात ऊँट की खाल पर की जाने वाली स्वर्ण मीनाकारी।
किशनगढ़ सबसे प्रसिद्ध है। नागरीदास नाम से काव्य रचने वाले राजा सावंत सिंह के आश्रय में चित्रकार निहालचंद ने वह चित्र बनाया जो बणी-ठणी कहलाता है और जिसे कला इतिहासकार एरिक डिकिंसन ने भारत की मोनालिसा कहा। किशनगढ़ का मुख अचूक पहचाना जाता है: कमल की पंखुड़ी जैसी लंबी तिरछी आँख, धनुषाकार भौंह, तीखी नासिका, नुकीली ठोड़ी और लंबी ग्रीवा, पृष्ठभूमि में गूँदलाव झील का जल। इस शैली की राधा और कृष्ण की आकृतियाँ भारतीय चित्रकला की श्रेष्ठतम कृतियों में हैं।
हाड़ौती: बूँदी और कोटा
बूँदी दोनों में प्राचीन है और प्रकृति का महान चित्रकार है। इसके चित्रों में आम तथा कदंब के वृक्ष, कमल सरोवर, नीला-हरा जल, काले वर्षा मेघ और पक्षी भरे रहते हैं, और वर्ष के बारह महीनों का विषय बारहमासा इसका प्रिय प्रसंग है। राव राजा उम्मेद सिंह के समय बनी बूँदी की चित्रशाला में राजस्थान के कुछ श्रेष्ठतम भित्ति चित्र हैं। कोटा सत्रहवीं शताब्दी में बूँदी से अलग हुआ और उसने अपनी विशेषता विकसित की, अर्थात शिकार दृश्य, विशेषकर घने वन में बाघ का शिकार, जो महाराव राम सिंह द्वितीय के समय चरम पर पहुँचा।
ढूँढाड़: जयपुर, अलवर और शेखावाटी
आमेर और जयपुर शैली सर्वाधिक औपचारिक है, जिसमें बड़े व्यक्तिचित्र, राजसी शोभायात्राएँ और स्वर्ण का उदार प्रयोग मिलता है। सवाई प्रताप सिंह इसके सबसे बड़े आश्रयदाता थे, और चित्रकार साहिबराम आदमकद व्यक्तिचित्रों के लिए स्मरण किए जाते हैं। अलवर अत्यंत सूक्ष्म तूलिका कार्य तथा हाथीदाँत पर बने लघुचित्रों के लिए जाना जाता है। शेखावाटी भिन्न प्रकार की है: वहाँ के सेठों ने अपनी हवेलियों की भीतरी और बाहरी दीवारें भित्ति चित्रों से ढक दीं, इसीलिए इस क्षेत्र को प्रायः खुली कला दीर्घा कहा जाता है।
लोक चित्रकला परंपराएँ
- फड़: लोक देवताओं पाबूजी तथा देवनारायण की गाथा कहने वाले लंबे कपड़े के पट, जिन्हें भीलवाड़ा के शाहपुरा के जोशी परिवार बनाते हैं और जिनके सामने भोपा गाकर कथा सुनाता है।
- कावड़: लकड़ी का छोटा मंदिर जिसके कपाट कथा के साथ एक-एक कर खुलते हैं, जो चित्तौड़गढ़ के बस्सी में बनता है।
- मांडणा: पर्वों पर स्त्रियाँ खड़िया और गेरू से फर्श तथा दीवारों पर जो ज्यामितीय आकृतियाँ बनाती हैं।
- उस्ता या मुनव्वत कार्य: ऊँट की खाल, चमड़े और दीवारों पर उभरा हुआ स्वर्ण कार्य, जो बीकानेर से जुड़ा है।
परीक्षा की दृष्टि से
राज्य के प्रश्नपत्र इस अध्याय को मिलान प्रश्नों के रूप में पूछते हैं, इसलिए इसे चार सूचियों की तरह तैयार कीजिए। पहली, शैली के साथ उपशैली: मेवाड़ के साथ चावंड, उदयपुर, नाथद्वारा और देवगढ़; मारवाड़ के साथ जोधपुर, बीकानेर और किशनगढ़; हाड़ौती के साथ बूँदी, कोटा और झालावाड़; ढूँढाड़ के साथ जयपुर, अलवर, शेखावाटी और उनियारा। दूसरी, शैली के साथ विशेषता: कोटा के साथ शिकार, बूँदी के साथ प्रकृति तथा बारहमासा, नाथद्वारा के साथ पिछवाई, किशनगढ़ के साथ बणी-ठणी, शेखावाटी के साथ भित्ति चित्र, अलवर के साथ हाथीदाँत के लघुचित्र। तीसरी, चित्रकार के साथ आश्रयदाता: निसारदीन के साथ अमर सिंह प्रथम, साहिबदीन के साथ जगत सिंह प्रथम, निहालचंद के साथ सावंत सिंह, साहिबराम के साथ सवाई प्रताप सिंह। चौथी, शिल्प के साथ स्थान: फड़ के साथ शाहपुरा, कावड़ के साथ बस्सी, उस्ता कार्य के साथ बीकानेर। सामान्य भूल यह है कि किशनगढ़ को मारवाड़ के बजाय ढूँढाड़ में रख दिया जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| चार शैलियाँ | मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती और ढूँढाड़ |
|---|---|
| सबसे प्राचीन शैली | मेवाड़ |
| मेवाड़ की पहली तिथियुक्त कृति | चावंड की रागमाला, 1605, निसारदीन द्वारा |
| मेवाड़ के प्रमुख चित्रकार | साहिबदीन, महाराणा जगत सिंह प्रथम के आश्रय में |
| बणी-ठणी | किशनगढ़ उपशैली, निहालचंद द्वारा चित्रित |
| किशनगढ़ के आश्रयदाता | राजा सावंत सिंह, कवि नागरीदास |
| भारत की मोनालिसा | बणी-ठणी को एरिक डिकिंसन द्वारा दिया गया नाम |
| शिकार दृश्य | कोटा उपशैली, महाराव राम सिंह द्वितीय के समय चरम पर |
| चित्रशाला | बूँदी, राव राजा उम्मेद सिंह के समय निर्मित |
| पिछवाई | नाथद्वारा, श्रीनाथजी के पीछे लगने वाले वस्त्र चित्र |
| खुली कला दीर्घा | शेखावाटी, हवेलियों के भित्ति चित्रों के कारण |
| फड़ चित्रकला | शाहपुरा, भीलवाड़ा; भोपा पट के सामने गाकर कथा कहता है |
| कावड़ | बस्सी, चित्तौड़गढ़; वहनीय काष्ठ मंदिर |
| उस्ता या मुनव्वत कला | बीकानेर; ऊँट की खाल पर उभरा स्वर्ण कार्य |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
प्रसिद्ध चित्र बणी-ठणी राजस्थानी चित्रकला की किस शैली से संबंधित है?
- A.बूँदी
- B.किशनगढ़
- C.नाथद्वारा
- D.बीकानेर
उत्तर देखें
बणी-ठणी मारवाड़ शैली की किशनगढ़ उपशैली की सर्वाधिक प्रसिद्ध एकल कृति है, जो अठारहवीं शताब्दी के मध्य में बनी, और कला इतिहासकार एरिक डिकिंसन ने इसे भारत की मोनालिसा कहा।
पूरी व्याख्या पढ़ें →बणी-ठणी चित्र किसने बनाया था?
- A.साहिबदीन
- B.निहालचंद
- C.साहिबराम
- D.रुकनुद्दीन
उत्तर देखें
निहालचंद ने वह लंबी, आदर्शीकृत मुखाकृति विकसित की जो किशनगढ़ शैली की पहचान है, और उसका प्रयोग राधा तथा कृष्ण के लिए भी किया और उस एकल चित्र के लिए भी जो आज बणी-ठणी कहलाता है और प्रायः गूँदलाव झील के जल की पृष्ठभूमि में दिखाया जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थानी चित्रकला की कौन सी शैली शिकार दृश्यों के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है?
- A.मेवाड़
- B.कोटा
- C.जयपुर
- D.जोधपुर
उत्तर देखें
कोटा सत्रहवीं शताब्दी में बूँदी से अलग हुआ और यद्यपि उसे बूँदी से घने वन तथा जल का भाव विरासत में मिला, उसने उस परिवेश को अपने ही विषय में बदल दिया, अर्थात राजसी शिकार में।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पिछवाई चित्र मुख्यतः राजस्थान के किस स्थान से जुड़े हैं?
- A.नाथद्वारा
- B.बूँदी
- C.शेखावाटी
- D.किशनगढ़
उत्तर देखें
पिछवाई कपड़े पर बना वह बड़ा चित्र है जो मंदिर में श्रीनाथजी के विग्रह के पीछे लगाया जाता है, शब्द का अर्थ ही है जो पीछे लटके, और इसे ऋतु तथा मनाए जा रहे पर्व के अनुसार बदला जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मेवाड़ शैली का सबसे प्राचीन तिथियुक्त रागमाला चित्र समूह 1605 में चावंड में किस चित्रकार ने बनाया था?
- A.साहिबदीन
- B.निसारदीन
- C.मनोहर
- D.बागता
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महाराणा प्रताप द्वारा राजधानी वहाँ ले जाने के बाद चावंड मेवाड़ का केंद्र बन चुका था, और यही समूह मेवाड़ शैली की पहली निश्चित तिथि वाली कृति है, इसीलिए यह बार-बार पूछा जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध चित्रशाला राजस्थान के किस नगर में है?
- A.बूँदी
- B.अलवर
- C.जैसलमेर
- D.नागौर
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चित्रशाला बूँदी के गढ़ महल के भीतर की दीर्घा है, जो राव राजा उम्मेद सिंह के समय बनी, और इसकी दीवारों तथा छतों पर राजस्थान के कुछ श्रेष्ठतम भित्ति चित्र हैं, जो बूँदी शैली के प्रिय नीले और हरे रंगों में बने हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →लोक देवताओं की गाथा कहने वाले लंबे कपड़े के पट, फड़ चित्रकला, परंपरागत रूप से कहाँ बनते हैं?
- A.चित्तौड़गढ़ का बस्सी
- B.भीलवाड़ा का शाहपुरा
- C.राजसमंद का नाथद्वारा
- D.झुंझुनूँ का मंडावा
उत्तर देखें
फड़ लंबा क्षैतिज वस्त्र है जिस पर किसी लोक देवता, प्रायः पाबूजी या देवनारायण, की पूरी जीवन गाथा प्रसंगों में अंकित होती है, और इसे केवल प्रदर्शन के लिए नहीं लटकाया जाता: भोपा नामक पुजारी-गायक इसे गाँव-गाँव ले जाता है, रात में खोलता है और दीपक के उजाले में हर…
पूरी व्याख्या पढ़ें →ऊँट की खाल पर उभरा स्वर्ण कार्य, उस्ता कला, राजस्थान के किस नगर से संबंधित है?
- A.बीकानेर
- B.उदयपुर
- C.कोटा
- D.जयपुर
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उस्ता कला, जिसे मुनव्वत या स्वर्ण मनोती कार्य भी कहते हैं, वह शिल्प है जिसमें पहले उभरी हुई आकृति बनाई जाती है और फिर उस पर स्वर्ण चढ़ाया जाता है; परंपरागत रूप से यह ऊँट की खाल पर होता है, पर चमड़े की वस्तुओं, काष्ठ तथा महलों की दीवारों और…
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र चित्रकला में मुख्यतः किसके लिए जाना जाता है?
- A.हाथीदाँत पर लघुचित्र
- B.हवेलियों की दीवारों पर भित्ति चित्र
- C.पिछवाई वस्त्र चित्र
- D.रागमाला पांडुलिपियाँ
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अठारहवीं शताब्दी से झुंझुनूँ, सीकर और चूरू जिलों के शेखावाटी क्षेत्र के सेठ परिवारों ने बड़े आँगन वाली हवेलियाँ बनवाईं और उनकी बाहरी तथा भीतरी दीवारों को चित्रित पलस्तर से ढकवाया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन सी ढूँढाड़ शैली की उपशैली है?
- A.नाथद्वारा
- B.किशनगढ़
- C.अलवर
- D.झालावाड़
उत्तर देखें
ढूँढाड़ शैली आमेर तथा जयपुर क्षेत्र की चित्रकला को समेटती है और इसकी उपशैलियों में अलवर, शेखावाटी और उनियारा आते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मेवाड़ कारखाने के प्रमुख चित्रकार साहिबदीन किस शासक के आश्रय में थे?
- A.महाराणा अमर सिंह प्रथम
- B.महाराणा जगत सिंह प्रथम
- C.महाराणा प्रताप
- D.महाराणा फतेह सिंह
उत्तर देखें
महल में चित्रकला का कारखाना चलता था और साहिबदीन उसके प्रमुख चित्रकार थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कावड़, वह वहनीय काष्ठ मंदिर जिसके कपाट कथा के साथ एक-एक कर खुलते हैं, कहाँ बनता है?
- A.चित्तौड़गढ़ का बस्सी
- B.राजसमंद का मोलेला
- C.जैसलमेर का पोकरण
- D.जयपुर का सांगानेर
उत्तर देखें
कावड़ आम की लकड़ी से बना छोटा मंदिर है, जिसे गहरे लाल रंग से रँगकर देवताओं तथा वीरों की आकृतियों से भर दिया जाता है और जिसमें कई कपाट लगे होते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राजस्थानी चित्रकला की चार प्रमुख शैलियाँ कौन सी हैं?
मेवाड़, मारवाड़, हाड़ौती और ढूँढाड़। मेवाड़ में चावंड, उदयपुर, नाथद्वारा तथा देवगढ़ आते हैं; मारवाड़ में जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर तथा जैसलमेर; हाड़ौती में बूँदी, कोटा तथा झालावाड़; और ढूँढाड़ में आमेर एवं जयपुर, अलवर, शेखावाटी तथा उनियारा।
बणी-ठणी को भारत की मोनालिसा क्यों कहा जाता है?
कला इतिहासकार एरिक डिकिंसन ने मुखाकृति के रहस्यमय, आदर्शीकृत सौंदर्य के कारण इसे यह नाम दिया। राजा सावंत सिंह के आश्रय में किशनगढ़ के निहालचंद द्वारा बनाए गए इस चित्र में लंबी तिरछी आँख, धनुषाकार भौंह, तीखी नासिका, नुकीली ठोड़ी और बहुत लंबी ग्रीवा है, और यह राजस्थानी चित्रकला की सर्वाधिक पहचानी जाने वाली छवि है।
पिछवाई क्या है?
पिछवाई नाथद्वारा के मंदिर में श्रीनाथजी के विग्रह के पीछे लगाया जाने वाला कपड़े पर बना बड़ा चित्र है, जिसे ऋतु और पर्व के अनुसार बदला जाता है। इसके विषय कृष्ण लीला, गाय, मोर, कमल और कदंब वृक्ष हैं, और यह परंपरा 1672 में विग्रह की नाथद्वारा में प्रतिष्ठा के बाद विकसित हुई।
फड़ और कावड़ में क्या अंतर है?
फड़ भीलवाड़ा के शाहपुरा में बनने वाला लंबा वस्त्र पट है, जिस पर पाबूजी या देवनारायण जैसे लोक देवता की गाथा अंकित होती है और जिसे भोपा गाकर सुनाता है। कावड़ चित्तौड़गढ़ के बस्सी में बनने वाला छोटा काष्ठ मंदिर है, जिसके कपाट कावड़िया भाट कथा कहते हुए एक-एक कर खोलता है।
राजस्थान की कौन सी शैली मुगल चित्रकला से सर्वाधिक प्रभावित है?
बीकानेर, जो मारवाड़ शैली की उपशैली है। रुकनुद्दीन के परिवार तथा अली रजा जैसे चित्रकारों ने यहाँ मुगल और दक्कनी शैलियों के निकट परिष्कृत ढंग से काम किया, जिसमें अन्य राजस्थानी शैलियों की तुलना में रंग कोमल और विवरण सूक्ष्म हैं।
शेखावाटी को खुली कला दीर्घा क्यों कहा जाता है?
क्योंकि झुंझुनूँ, सीकर और चूरू के सेठ परिवारों ने अपनी हवेलियों की भीतरी तथा बाहरी दीवारें भित्ति चित्रों से ढक दीं। इनमें से बहुत से चित्र बाहरी दीवारों पर हैं और सड़क से दिखाई देते हैं, इसलिए पूरा क्षेत्र बिना छत की दीर्घा जैसा लगता है।
स्रोत
- भारतीय कला का परिचय भाग 2 (कक्षा 12), राजस्थानी और पहाड़ी लघुचित्र शैलियों का अध्याय — एनसीईआरटी
- राजस्थान अध्ययन: राजस्थान की कला, संस्कृति और चित्रकला — राजस्थान राज्य परीक्षा पाठ्यक्रम की मानक संदर्भ सामग्री





