राजस्थान की वेशभूषा, आभूषण और रीति-रिवाज: परीक्षा नोट्स
राजस्थान परीक्षाओं के लिए नोट्स: पुरुष और स्त्री की पोशाक तथा पगड़ी, ओढ़नी और उसकी छपाई, सिर से पैर तक के आभूषण, तथा जन्म, विवाह और मृत्यु के रीति-रिवाज।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 4 मिनट

राजस्थान में वेशभूषा और आभूषण केवल सजावट नहीं हैं; वे सूचना देते हैं। पगड़ी का रंग अवसर बताता है, ओढ़नी की छपाई ऋतु और परिवार की घटना बताती है, और स्त्री के आभूषण उसका अंचल तथा विवाहित होना बताते हैं। मरुभूमि दिन में तपती है और रात में ठंडी हो जाती है तथा जल दुर्लभ है, इसलिए यहां के वस्त्र ढीले, परतदार और ऐसे रंगों में रंगे होते हैं जो धूल छिपा लें। राज्य सेवा और पुलिस की परीक्षाएं इस अध्याय से हर वर्ष दो तीन प्रश्न पूछती हैं, और प्रायः वे किसी नाम को शरीर के अंग, जिले या अवसर से मिलाने के रूप में आते हैं।
पुरुषों की वेशभूषा
पुरुष की मूल पोशाक धोती, ऊपरी वस्त्र और सिर का कपड़ा है। अंगरखा छाती पर बंधने वाला लंबा वस्त्र है और उसका छोटा रूप बुगतरी कहलाता है; आतमसुख शीतकाल में पहना जाने वाला लंबा रुईदार कोट है; पटका या कमरबंद कमर पर बांधा जाने वाला वस्त्र है। सिर के कपड़े के दो नाम हैं, साफा और पगड़ी, जो बिल्कुल एक नहीं हैं: मारवाड़ का साफा चौड़ा, कड़ा और कम कपड़े से बंधता है, जबकि जयपुर और शेखावाटी की पगड़ी लंबी तथा अधिक बारीकी से लपेटी जाती है। पगड़ी की शैलियों के नाम राजसी हैं, जिनमें महाराणा अमर सिंह के नाम पर उदयपुर की अमरशाही, शाहजहानी, उदयशाही, स्वरूपशाही और खिदमतिया प्रमुख हैं। रंग अपनी अलग भाषा है: केसरिया पगड़ी शौर्य की प्रतीक है और युद्ध में पहनी जाती थी, सफेद शोक में पहनी जाती है, और पंचरंगा तथा लहरिया साफे तीज और गणगौर जैसे त्योहारों के हैं।
स्त्रियों की वेशभूषा और ओढ़नी
स्त्री घाघरा पहनती है, जो चौड़ा चुन्नटदार लहंगा है, उसके ऊपर कांचली या कुर्ती और दोनों पर ओढ़नी। ओढ़नी, जिसे चूनरी या लुगड़ी भी कहते हैं, राज्य का सबसे अभिव्यंजक वस्त्र है, क्योंकि उसका रंग और छपाई अवसर की घोषणा करते हैं। पोमचा कमल के फूलों से छपी पीली ओढ़नी है, जो संतान के जन्म के बाद स्त्री को दी जाती है और तीज पर पहनी जाती है; लहरिया अपनी तिरछी लहरदार धारियों के साथ वर्षा और तीज का है; मोठड़ा अपने चौखानों के साथ तब बनता है जब कपड़े को लहरिया के लिए दोनों दिशाओं में बांधा जाए; और चूनरी या बंधेज सामान्य बांधकर रंगने की कला है।
| वस्त्र या छपाई | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| बंधेज | जयपुर, जोधपुर, सीकर, उदयपुर | रंगने से पहले कपड़ा बांधकर छोड़ी गई छोटी बिंदियां |
| लहरिया | जयपुर और जोधपुर | तिरछी लहरदार धारियां, वर्षा ऋतु में पहना जाता है |
| मोठड़ा | जयपुर और जोधपुर | चौखाने, लहरिया को दोनों दिशाओं में बांधकर बनाया जाता है |
| सांगानेरी छपाई | सांगानेर, जयपुर | श्वेत पृष्ठभूमि पर बारीक पुष्प ठप्पा छपाई |
| बगरू छपाई | बगरू, जयपुर | फीकी पृष्ठभूमि पर काले और लाल रंग की बड़ी आकृतियां |
| दाबू छपाई | आकोला, चित्तौड़गढ़ | अवरोधक छपाई जिसमें मिट्टी का लेप रंग रोकता है |
| अजरक छपाई | बाड़मेर | नील और मजीठ लाल रंग में ज्यामितीय आकृतियां |
| पोमचा | जयपुर और शेखावाटी | कमल वाली पीली ओढ़नी, संतान जन्म और तीज पर |
सिर से पैर तक के आभूषण
राजस्थानी आभूषणों की सूची लंबी है और परीक्षक यह पूछकर उसे जांचते हैं कि कोई नामित आभूषण कहां पहना जाता है। इसे याद करने का सबसे सुरक्षित तरीका शरीर पर ऊपर से नीचे उतरना है।
| शरीर का अंग | आभूषण |
|---|---|
| सिर | बोरला या राखड़ी, शीशफूल, मेमंद, मांग टीका, दामना |
| कान | झुमका, सुरलिया, पीपलपत्रा, झेला, ओगनिया; पुरुषों के लिए मुरकिया |
| नाक | नथ, बेसर, लौंग, चोप, भंवरिया, फीणी |
| गला | हंसली, तिमणिया, आड़, मोहनमाला, चंदनहार, तुस्सी, हमेल |
| बांह और हाथ | बाजूबंद, चूड़ा, गोखरू, पछेली, कंगन, हथफूल, आरसी |
| कमर | स्त्रियों के लिए करधनी या तगड़ी, पुरुषों के लिए कंदोरा |
| पैर | पायल, झांझर, नेवरी, कड़ला, आंवला, बिछिया, टोडर |
बोरला, जो मारवाड़ की विवाहित स्त्रियां माथे के मध्य में पहनती हैं, और आड़, जो गले का चौड़ा चपटा आभूषण है, सबसे अधिक पूछे जाते हैं। पूरी सूची पर रिवाज का एक नियम चलता है: सोना कमर से नीचे नहीं पहना जाता, इसलिए पायजेब और बिछिया चांदी के बनते हैं, जबकि सिर, गले और बांह के आभूषण सोने के हो सकते हैं।
जन्म, विवाह और मृत्यु के रीति-रिवाज
जन्म के बाद माता जलवा पूजन करती है, अर्थात कुएं या जल की पूजा, और नामकरण पर बच्चे का नाम रखा जाता है। बालक के पहले बाल उतारने की रस्म जड़ूला या मुंडन प्रायः रामदेवरा, खाटूश्यामजी या सालासर में मनौती के रूप में की जाती है। बालक की पहली होली पर धूंध की रस्म होती है। विवाह में मामा अपनी बहन के बच्चों के लिए उपहार लाता है, इस रिवाज को मायरा या भात कहते हैं, और घर की स्त्रियां अनुष्ठान से पहले रातिजगा करती हैं, अर्थात लोकगीतों की रात। फेरों से पहले दूल्हा वधू के द्वार पर लगे तोरण पर प्रहार करता है, और वर तथा वधू के लिए बन्ना और बन्नी गीत गाए जाते हैं। कुछ समुदायों में स्त्री नाता प्रथा से पुनर्विवाह कर सकती है, और दो परिवारों के बीच वधुओं के आदान प्रदान को आटा साटा कहते हैं; भीलों में वधू के पिता को दी जाने वाली राशि दापा है, और अप्राकृतिक मृत्यु पर मांगा जाने वाला हर्जाना मौताणा। मृत्यु के बाद परिवार मौसर अर्थात भोज देता है, और पगड़ी रस्म में उत्तराधिकारी के सिर पर पगड़ी रखी जाती है। कई पुराने रिवाज कानून से समाप्त किए जा चुके हैं: सती को 1987 के केंद्रीय अधिनियम ने और डायन प्रथा को राजस्थान के 2015 के अधिनियम ने अवैध ठहराया।
परीक्षा की दृष्टि से
परीक्षाएं इस अध्याय को लगभग पूरी तरह सुमेलन से जांचती हैं। आभूषण के सामने शरीर का अंग, छपाई के सामने जिला, रिवाज के सामने अवसर, और पगड़ी शैली के सामने शासक या अंचल पूछा जाता है। सबसे अधिक पूछे जाने वाले आभूषण हैं सिर के लिए बोरला, गले के लिए आड़ और तिमणिया, बांह के लिए बाजूबंद, कमर के लिए करधनी और पैरों के लिए नेवरी। छपाई में सांगानेर, बगरू, आकोला और बाड़मेर वे चार स्थान हैं जिन पर परीक्षक लौटते रहते हैं। रिवाजों में मायरा, रातिजगा, नाता, आटा साटा, मौताणा और मौसर बार बार आते हैं। भ्रम के बिंदु हैं बोरला को बेसर समझ लेना, जो नाक में पहना जाता है, दाबू को आकोला के स्थान पर सांगानेर में रख देना, और पोमचा को, जो जन्म के बाद आता है, लहरिया से मिला देना, जो ऋतु के साथ आता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| साफा | मारवाड़ की पगड़ी, चौड़ी और कड़ी, कम कपड़े से बंधने वाली |
|---|---|
| अमरशाही पगड़ी | उदयपुर की शैली, महाराणा अमर सिंह के नाम पर |
| केसरिया पगड़ी | शौर्य का प्रतीक और युद्ध में पहनी जाती थी; सफेद शोक में |
| आतमसुख | पुरुषों द्वारा शीतकाल में पहना जाने वाला लंबा रुईदार कोट |
| अंगरखा और बुगतरी | छाती पर बंधने वाला लंबा वस्त्र और उसका छोटा रूप |
| पोमचा | कमल छपी पीली ओढ़नी, संतान जन्म के बाद और तीज पर |
| लहरिया और मोठड़ा | तिरछी लहरदार धारियां, और दोनों दिशाओं में बांधने से बने चौखाने |
| सांगानेरी छपाई | श्वेत पर बारीक पुष्प ठप्पा छपाई, जयपुर के सांगानेर से |
| दाबू छपाई | मिट्टी से अवरोध वाली छपाई, चित्तौड़गढ़ के आकोला से |
| अजरक छपाई | नील और लाल रंग की ज्यामितीय छपाई, बाड़मेर से |
| बोरला या राखड़ी | विवाहित स्त्रियों का गोल शीश आभूषण, मुख्यतः मारवाड़ में |
| आड़ और तिमणिया | गले में पहने जाने वाले आभूषण |
| करधनी या तगड़ी | कमर का आभूषण; पुरुषों का रूप कंदोरा है |
| मायरा या भात | विवाह में मामा द्वारा लाए गए उपहार |
| रातिजगा | अनुष्ठान से पहले होने वाली लोकगीतों की रात |
| मौताणा | भीलों में अप्राकृतिक मृत्यु पर मांगा जाने वाला हर्जाना |
| मौसर | मृत्यु के बाद परिवार द्वारा दिया जाने वाला भोज |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
बोरला, जिसे राखड़ी भी कहा जाता है, शरीर के किस अंग पर पहना जाने वाला आभूषण है?
- A.सिर
- B.नाक
- C.कमर
- D.पैर
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बोरला छोटा गोल आभूषण है जो मांग से लटककर माथे के मध्य में टिकता है; यह विवाहित स्त्री का चिह्न है और सबसे अधिक मारवाड़ का है, जहां इसे राखड़ी भी कहते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान में निम्नलिखित में से कौन सा आभूषण कमर पर पहना जाता है?
- A.तिमणिया
- B.करधनी
- C.बाजूबंद
- D.नेवरी
उत्तर देखें
करधनी, जिसे तगड़ी भी कहते हैं, कड़ियों से बनी वह पट्टी है जो स्त्रियां कमर पर पहनती हैं; पुरुषों का तत्संबंधी आभूषण कंदोरा है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कमल के फूलों से छपी पीली ओढ़नी पोमचा परंपरा के अनुसार स्त्री को कब भेंट की जाती है?
- A.संतान के जन्म के बाद
- B.परिवार में मृत्यु के अवसर पर
- C.पीहर जाते समय
- D.कृषि वर्ष के पहले दिन
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इसका नाम कमल के लिए प्रयुक्त शब्द से आया है, जो इस छपाई की मुख्य आकृति है, और पीली पृष्ठभूमि शुभ अवसर की सूचक है; यह वस्त्र प्रसव के बाद माता को दिया जाता है और तीज तथा अन्य उत्सवों पर भी पहना जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान का लहरिया वस्त्र विशेष रूप से किस ऋतु से जुड़ा है?
- A.शीत ऋतु
- B.वर्षा ऋतु
- C.ग्रीष्म ऋतु
- D.शरद ऋतु
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लहरिया का नाम लहर शब्द से बना है, और कपड़े को लपेटकर तथा बांधकर रंगने से बनी उसकी तिरछी धारियां वर्षा के बहते जल की प्रतीक मानी जाती हैं; इस छपाई के साफे और ओढ़नियां सावन में तथा उसी मास में पड़ने वाले तीज पर पहने जाते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →प्रसिद्ध सांगानेरी ठप्पा छपाई राजस्थान के किस जिले की है?
- A.जयपुर
- B.बाड़मेर
- C.चित्तौड़गढ़
- D.बीकानेर
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सांगानेर जयपुर नगर के ठीक दक्षिण में है और श्वेत या क्रीम पृष्ठभूमि पर बारीक पुष्प ठप्पा छपाई के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें रेखाएं सूक्ष्म और रंग कोमल होते हैं, और उसी जिले का पड़ोसी गांव बगरू काले तथा लाल रंग में बड़ी आकृतियां छापता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →दाबू छपाई, जिसमें रंग रोकने के लिए मिट्टी के लेप का प्रयोग होता है, सर्वाधिक किससे जुड़ी है?
- A.चित्तौड़गढ़ का आकोला
- B.जयपुर का सांगानेर
- C.राजसमंद का नाथद्वारा
- D.जैसलमेर का पोकरण
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दाबू में छपाईकार कपड़े पर मिट्टी, गोंद और अन्य सामग्री का लेप ठप्पे से लगाता है, फिर उसे रंगता है और अंत में लेप धो देता है जिससे ढके हुए भाग बिना रंगे रह जाते हैं, और आकोला वही केंद्र है जिससे यह शिल्प पहचाना जाता है, यद्यपि यह तकनीक…
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान में वह रिवाज, जिसमें मामा अपनी बहन के बच्चे के विवाह पर उपहार लेकर आता है, क्या कहलाता है?
- A.नाता
- B.मायरा या भात
- C.मौसर
- D.तोरण
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माता का भाई अपनी बहन और उसके बच्चों के लिए वस्त्र, आभूषण और धन लेकर आता है, और इस अवसर को ननिहाल का बाध्यकारी दायित्व माना जाता है, जिसके अपने गीत भी गाए जाते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान की लोक परंपरा में रातिजगा किसे कहते हैं?
- A.किसी अनुष्ठान से पहले होने वाली लोकगीतों की रात
- B.वर्षा ऋतु में किसी मंदिर पर लगने वाला मेला
- C.कढ़ाईदार घाघरे का एक प्रकार
- D.गांव के कारीगरों पर पहले लगने वाला कर
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विवाह, नामकरण या किसी अन्य गृह संस्कार से पहले की रात को घर की स्त्रियां जागकर कुलदेवताओं की स्तुति में गीत गाती हैं; शब्द का अर्थ ही रात भर जागरण है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →तिमणिया नामक आभूषण शरीर के किस अंग पर पहना जाता है?
- A.गला
- B.बांह
- C.टखना
- D.कान
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तिमणिया नगों से जड़ा चौड़ा आभूषण है जो कंठ के पास पहना जाता है, और वह हंसली, आड़, मोहनमाला तथा चंदनहार के उसी परिवार का है, जो सब राजस्थान के गले के आभूषण हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →दक्षिणी राजस्थान के कुछ जनजातीय समुदायों में प्रचलित मौताणा प्रथा किसे कहते हैं?
- A.पुत्र के जन्म पर दिया जाने वाला भोज
- B.अप्राकृतिक मृत्यु पर मांगा जाने वाला हर्जाना
- C.दो परिवारों के बीच वधुओं का आदान प्रदान
- D.गांव के पुरोहित को दिया जाने वाला फसल का हिस्सा
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भील और गरासिया समुदायों में दुर्घटना या झगड़े में मरे व्यक्ति का परिवार उस परिवार से भुगतान मांगता है जिसे उत्तरदायी माना जाता है, और यह राशि परंपरागत रूप से पंचायत तय करती थी; प्रशासन लंबे समय से इसे हतोत्साहित करता रहा है क्योंकि अनिपटे दावे लंबी रंजिश बन जाते…
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थानी पुरुषों की पारंपरिक वेशभूषा में आतमसुख क्या है?
- A.शीतकाल में पहना जाने वाला लंबा रुईदार कोट
- B.कमर पर बांधा जाने वाला वस्त्र
- C.विवाह में पहनी जाने वाली एक प्रकार की पगड़ी
- D.कढ़ाईदार जूतियों की एक जोड़ी
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मरुभूमि शीत के महीनों में रात को अत्यंत ठंडी हो जाती है, और आतमसुख, जिसका नाम ही अपने को सुख देने का भाव रखता है, वह लंबा रुईदार कोट है जो उस ऋतु में सामान्य वस्त्रों के ऊपर पहना जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राजस्थान में मौसर किसे कहा जाता है?
- A.मृत्यु के बाद परिवार द्वारा दिया जाने वाला भोज
- B.बालक के पहले बाल उतारने की रस्म
- C.विवाह से पहले की सगाई की रस्म
- D.जन्म के बाद कुएं की पूजा
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मौसर अंत्येष्टि के कुछ दिनों बाद होता है और उसमें पूरे समाज को निमंत्रित किया जाता है, और चूंकि निर्धन परिवार इसे करने के लिए प्रायः भारी ऋण ले लेते थे, समाज सुधारक तथा राज्य लंबे समय से इसे सादा रखने का आग्रह करते रहे हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बोरला शरीर के किस अंग पर पहना जाता है?
बोरला, जिसे राखड़ी भी कहते हैं, माथे के मध्य में मांग से लटकता हुआ छोटा गोल आभूषण है। यह विवाहित स्त्री का चिह्न है और सबसे अधिक मारवाड़ से जुड़ा है। परीक्षार्थी इसे प्रायः बेसर से मिला देते हैं, जो नाक का आभूषण है, और शीशफूल से भी, जो सिर पर तो पहना जाता है पर मांग के बजाय बालों पर फैला रहता है।
पोमचा क्या है और कब पहना जाता है?
पोमचा कमल के फूलों से छपी पीली ओढ़नी है, जिसका नाम कमल के लिए प्रयुक्त शब्द से आया है। परंपरा के अनुसार यह संतान के, विशेषकर पुत्र के, जन्म के बाद स्त्री को भेंट की जाती है और तीज तथा अन्य शुभ अवसरों पर भी पहनी जाती है। इसकी पीली पृष्ठभूमि इसे लहरिया से अलग करती है, जो वर्षा ऋतु में पहना जाता है, और सादे बंधेज से भी।
साफा और पगड़ी में क्या अंतर है?
दोनों सिर के वस्त्र हैं, पर उन्हें बांधने का ढंग अलग है। साफा मारवाड़ और पश्चिमी मरुभूमि की पगड़ी है, जो अधिक चौड़ी तथा कड़ी होती है और कम लंबाई के कपड़े से बंधती है। जयपुर और शेखावाटी की पगड़ी लंबी होती है, अधिक बारीकी से लपेटी जाती है और प्रायः अमरशाही या शाहजहानी जैसी किसी विशेष राजसी शैली में बांधी जाती है।
मायरा या भात का रिवाज क्या है?
जब किसी परिवार में विवाह होता है तो वर या वधू का मामा अपनी बहन और उसके बच्चों के लिए वस्त्र, आभूषण और धन लेकर आता है। इन उपहारों को लाने और भेंट करने की रस्म राजस्थान के कुछ भागों में मायरा और कुछ में भात कहलाती है, और इसे शिष्टाचार मात्र नहीं बल्कि ननिहाल का दायित्व माना जाता है।
राजस्थान में पायल चांदी की क्यों बनाई जाती है, सोने की क्यों नहीं?
रिवाज मानता है कि सोना, जो धन की देवी से जुड़ा है, कमर से नीचे नहीं पहनना चाहिए। इसलिए सिर, गले, बांह और हाथ के आभूषण सोने के हो सकते हैं, जबकि पैरों में पहनी जाने वाली पायल, झांझर, नेवरी, कड़ला और बिछिया चांदी की बनती हैं। यह नियम कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक है, पर पूरे राज्य में व्यापक रूप से माना जाता है।
मौताणा क्या है?
मौताणा दक्षिणी राजस्थान के भील और गरासिया समुदायों में पाया जाने वाला रिवाज है, जिसमें अप्राकृतिक मृत्यु मरने वाले व्यक्ति का परिवार उस परिवार से हर्जाना मांगता है जिसे उत्तरदायी माना जाता है। यह राशि परंपरागत रूप से पंचायत तय करती थी, और प्रशासन लंबे समय से इस प्रथा को हतोत्साहित करता रहा है क्योंकि इससे लंबी रंजिशें चलती हैं।
स्रोत
- राज्य की कला, संस्कृति और शिल्प — राजस्थान सरकार
- राजस्थान के वस्त्र, वेशभूषा और आभूषण — संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार





