हरियाणा की वेशभूषा, रीति-रिवाज और खान-पान: नोट्स
एचएसएससी और सीईटी परीक्षाओं के लिए हरियाणा की वेशभूषा, रीति-रिवाज और खान-पान के नोट्स: पोशाक, गहने, विवाह और जन्म की रस्में, पर्व तथा प्रमुख व्यंजन।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

हरियाणा का गाँव कैसे वस्त्र पहनता है, विवाह करता है और क्या खाता है, यह एचएसएससी, एचपीएससी और सीईटी के प्रश्नपत्रों में उतनी ही सीधी तरह पूछा जाता है जितनी राज्य की नदियाँ और नहरें, क्योंकि ये वही तथ्य हैं जो इस राज्य को पड़ोसी राज्यों से अलग करते हैं। वेशभूषा खेत के काम और गर्मी के अनुकूल है, गहनों के नाम केवल इसी अंचल के हैं, विवाह के रीति-रिवाज परिवार से अधिक गोत्र और गाँव से तय होते हैं, और रसोई बाजरा, दूध तथा घी पर टिकी है। इस अध्याय में वेशभूषा, अंग के अनुसार गहने, जन्म-विवाह-मृत्यु के रीति-रिवाज और अवसर के अनुसार व्यंजन दिए गए हैं।
स्त्रियों और पुरुषों की वेशभूषा
हरियाणवी स्त्री की पारंपरिक पोशाक तीन भागों की होती है: दामन, अर्थात चुन्नटों वाला लंबा घाघरा; कुर्ती या अंगी, अर्थात छोटा ऊपरी वस्त्र; और चुंदर या ओढ़नी, अर्थात सिर तथा कंधे पर डाली जाने वाली लंबी चादर। कुछ जिलों में दामन के स्थान पर घाघरी पहनी जाती है, और चुंदर के रंगों का अपना अर्थ है, नववधू के लिए लाल तथा पीला और बड़ी उम्र की स्त्री के लिए चटक किनारी वाला काला। पुरुष धोती के साथ कुर्ता और पगड़ी पहनता है, जिसे स्थानीय ढंग से बाँधा जाता है, पैरों में जूती और कंधे पर अंगोछा अर्थात पतला सूती कपड़ा रहता है; जाड़े में कुर्ते के ऊपर खेस या लोई लपेटी जाती है और उस पर मिरजई नामक छोटी जैकेट पहनी जाती है। खेस, अर्थात मोटा दोहरी बुनाई वाला सूती ओढ़ना, राज्य का सबसे प्रसिद्ध हथकरघा उत्पाद है और सबसे अधिक पानीपत से जुड़ा है, जो हरियाणा का वस्त्र नगर है और पंजा दरी भी बुनता है।
अंग के अनुसार गहने
| शरीर का अंग | गहने |
|---|---|
| सिर और माथा | शीशफूल, दामिनी, बोर |
| कान | कर्णफूल, झुमका, बाली |
| नाक | नथ, लौंग, बुलाक |
| गला | हंसली, कंठी, गलसरी, हमेल |
| बाँह और कलाई | बाजूबंद, पछेली, कंगन, चूड़ा |
| कमर | तगड़ी या करधनी |
| पैर और टखना | पाजेब, कड़े, पैर की उँगलियों में बिछुआ |
इनमें से अधिकांश सोने के बजाय चाँदी के बनते थे, क्योंकि किसान परिवार की पहुँच चाँदी तक ही थी; गले की भारी हंसली और कलाई की पछेली आज भी लोकगीतों तथा सांग के मंच पर हरियाणवी वधू की पहचान हैं।
जन्म, विवाह और मृत्यु के रीति-रिवाज
जन्म के छठे दिन घर में छठी मनाई जाती है, जिसमें माँ और शिशु को स्नान कराया जाता है और परिवार गीत गाता है; अनेक गाँवों में इसके बाद कुआँ पूजन होता है। विवाह के रीति-रिवाज इस अध्याय का केंद्र हैं। ग्रामीण हरियाणा बहिर्विवाह का कठोर नियम मानता है: पिता तथा माता के गोत्र में विवाह नहीं किया जाता, और गाँव के भीतर भी नहीं, क्योंकि एक गाँव के सभी परिवार भाईचारा माने जाते हैं; इसी कारण वधू प्राय: गाँव के बाहर से आती है। खाप, अर्थात एक ही गोत्र या गोत्र समूह के गाँवों की पंचायत, वह पुरानी सामाजिक संस्था है जो ऐसे नियम लागू करती और विवाद सुलझाती थी, और गाँव के बीच बनी चौपाल उसकी बैठक का स्थान थी।
संस्कार रोका और सगाई से आरंभ होकर बान, मेहंदी, भात, फेरे और विदाई तक चलते हैं। भात वह भेंट है जो माँ का भाई अपनी बहन के पुत्र या पुत्री के विवाह पर लाता है, और उसे लाने की रस्म, भात भरना, स्वयं एक अवसर है, जिसमें घर मामा के परिवार का सम्मान करता है। पति की मृत्यु के बाद विधवा का उसके छोटे भाई से पुनर्विवाह करेवा कहलाता है, जिसे चादर डालना या चादर अंदाजी भी कहते हैं, क्योंकि नए विवाह के प्रतीक रूप में स्त्री पर चादर डाली जाती है; इससे ज़मीन और संतान परिवार में ही रहती थी और इस प्रथा का उल्लेख इस क्षेत्र की औपनिवेशिक बंदोबस्त रिपोर्टों में मिलता है। मृत्यु के बाद क्रिया और तेरहवें दिन तेरहवीं होती है।
पर्वों के रीति-रिवाज
सावन मास की हरियाली तीज राज्य का स्त्रियों का पर्व है, जिसमें पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं, विवाहित बेटी के मायके से नए वस्त्र भेजे जाते हैं और घेवर खाया जाता है। भादों में गुग्गा नौमी नाग देवता गुग्गा पीर को समर्पित है और उनकी छड़ी घर-घर ले जाई जाती है। नवरात्र में लड़कियाँ सांझी बनाती हैं, अर्थात आँगन की दीवार पर मिट्टी और गोबर से देवी की आकृति गढ़कर नौ रातों तक उसका शृंगार करती हैं। रक्षाबंधन यहाँ सलोनो कहलाता है, होली दुल्हंडी के रूप में खेली जाती है, और गुग्गा तथा देवी के मेले एवं सूरजकुंड शिल्प मेला शेष पंचांग भरते हैं।
हरियाणवी रसोई
राज्य का भोजन बाजरा, गेहूँ, चना, दूध और घी पर टिका है, और यह कहावत कि हरियाणा दूध-दही का देस है, राज्य का अपना परिचय है। रोज़ का भोजन बाजरे या गेहूँ की रोटी, एक सब्ज़ी, सफ़ेद मक्खन और एक गिलास लस्सी है। नामी व्यंजनों में बाजरे की खिचड़ी, बाजरा आलू रोटी, बेसन मसाला रोटी, हरा चोलिया, कचरी की चटनी, मेथी गाजर, बथुआ रायता और पकौड़ों वाली गाढ़ी हरियाणवी कढ़ी हैं। मिष्ठान्न ऋतु और पर्व से बँधे हैं: तीज पर घेवर, मेलों में मालपुआ तथा गुलगुले, चूरमा, मीठे चावल, खीर, और जाड़े में अलसी की पिन्नी तथा गोंद के लड्डू, जो गर्मी के लिए खाए जाते हैं। अभ्यर्थी को प्रत्येक व्यंजन का अवसर बताना आना चाहिए, क्योंकि प्रश्न इसी रूप में बनता है।
प्रश्नपत्र क्या पूछता है
इस अध्याय से तीन प्रकार के प्रश्न आते हैं: गहना और शरीर का अंग, स्त्री के साथ दामन तथा चुंदर और पुरुष के साथ खेस तथा पगड़ी; रिवाज और उसका नाम, विधवा के पुनर्विवाह के लिए करेवा और मामा की भेंट के लिए भात; तथा व्यंजन और उसका अवसर, तीज के साथ घेवर और जाड़े के साथ अलसी की पिन्नी। नाम स्थानीय हैं, इसलिए अध्याय को पढ़ जाने से अधिक महत्त्व प्रत्येक शब्द का अर्थ याद रखने का है।
परीक्षा की दृष्टि से
एचएसएससी, एचपीएससी, सीईटी और हरियाणा पुलिस के प्रश्नपत्र इस अध्याय को सीधे मिलान के रूप में पूछते हैं, और नाम स्थानीय हैं, इसलिए प्रत्येक शब्द का अर्थ जानना आवश्यक है। वस्त्र देकर पहनने वाला पूछा जाता है, स्त्री के लिए दामन तथा चुंदर और पुरुष के लिए खेस तथा पगड़ी; गहना देकर अंग पूछा जाता है, जिसमें हंसली गले का, पछेली कलाई का, तगड़ी कमर का और पाजेब टखने का है; रिवाज देकर उसका अर्थ पूछा जाता है, जिसमें करेवा विधवा का पुनर्विवाह, भात मामा की भेंट, छठी जन्म का छठा दिन और तेरहवीं मृत्यु का तेरहवाँ दिन है; तथा व्यंजन देकर अवसर पूछा जाता है, जिसमें घेवर तीज का, अलसी की पिन्नी और गोंद के लड्डू जाड़े के तथा मीठे चावल पर्वों के हैं। कथन आधारित प्रश्न खाप, चौपाल और गाँव में विवाह न करने के नियम को एक साथ जोड़ सकता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| स्त्री की पोशाक | दामन, कुर्ती या अंगी, चुंदर या ओढ़नी; कुछ जिलों में घाघरी |
|---|---|
| पुरुष की पोशाक | धोती, कुर्ता, पगड़ी, जूती, अंगोछा; जाड़े में खेस, लोई और मिरजई |
| खेस और दरी | हरियाणा के वस्त्र नगर पानीपत का हथकरघा |
| सिर के गहने | शीशफूल, दामिनी, बोर |
| कान और नाक | कर्णफूल, झुमका, बाली; नथ, लौंग, बुलाक |
| गले के गहने | हंसली, कंठी, गलसरी, हमेल |
| बाँह और कलाई | बाजूबंद, पछेली, कंगन, चूड़ा |
| कमर और टखना | तगड़ी या करधनी; पाजेब, कड़े, बिछुआ |
| लोक गहनों की धातु | अधिकतर चाँदी, जो किसान परिवार की पहुँच में थी |
| विवाह का नियम | पिता तथा माता के गोत्र और गाँव में विवाह वर्जित |
| खाप | एक गोत्र के गाँवों की पंचायत; बैठक चौपाल पर |
| करेवा | विधवा का छोटे भाई से पुनर्विवाह; चादर डालना |
| भात | विवाह पर माँ के भाई की भेंट; भात भरना |
| जन्म के रिवाज | छठे दिन छठी, कुएँ पर कुआँ पूजन |
| तीज | सावन; झूले, मायके से वस्त्र, घेवर |
| गुग्गा नौमी | भादों; नाग देवता गुग्गा पीर; छड़ी और मड़ी |
| सांझी | नवरात्र में आँगन की दीवार पर देवी की आकृति |
| मुख्य अनाज | बाजरा; रोटी, खिचड़ी और राबड़ी के रूप में |
| जाड़े के मिष्ठान्न | अलसी की पिन्नी और गोंद के लड्डू |
| राज्य की अपनी कहावत | दूध-दही का खाना |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
दामन, कुर्ती और चुंदर मिलकर हरियाणा में किसकी पारंपरिक पोशाक बनाते हैं?
- A.स्त्रियों की
- B.पुरुषों की
- C.मंदिर के पुजारियों की
- D.केवल सांग कलाकारों की
उत्तर देखें
हरियाणवी स्त्री की पारंपरिक पोशाक तीन भागों से बनती है: दामन, अर्थात चुन्नटों वाला लंबा घाघरा; कुर्ती या अंगी, अर्थात छोटा ऊपरी वस्त्र; और चुंदर या ओढ़नी, अर्थात सिर तथा कंधे पर डाली जाने वाली लंबी चादर।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पाजेब नामक गहना शरीर के किस अंग पर पहना जाता है?
- A.गले पर
- B.टखने पर
- C.कमर पर
- D.माथे पर
उत्तर देखें
पाजेब हरियाणवी स्त्री का पायल है, जो टखनों पर कड़े और उँगलियों पर बिछुआ के साथ पहना जाता है, और परंपरा में यह सोने के बजाय चाँदी का बनता था, क्योंकि किसान परिवार की पहुँच चाँदी तक ही थी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हरियाणवी समाज में करेवा किस प्रथा को कहते हैं?
- A.विवाह पर मामा द्वारा लाई गई भेंट
- B.पति की मृत्यु के बाद विधवा का उसके छोटे भाई से पुनर्विवाह
- C.जन्म के बाद गाँव के कुएँ की पूजा
- D.मृत्यु के तेरहवें दिन का भोज
उत्तर देखें
करेवा, जिसे चादर डालना या चादर अंदाजी भी कहा जाता है, क्योंकि नए विवाह के प्रतीक रूप में स्त्री पर चादर डाली जाती है, ग्रामीण हरियाणा में व्यापक रूप से प्रचलित था और इस क्षेत्र की औपनिवेशिक बंदोबस्त रिपोर्टों में इसका उल्लेख है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हरियाणवी विवाह में भात किस संबंधी द्वारा लाई जाने वाली भेंट है?
- A.वधू के पिता द्वारा
- B.माँ के भाई अर्थात मामा द्वारा
- C.पिता की बहन द्वारा
- D.वर के बड़े भाई द्वारा
उत्तर देखें
भात वस्त्र, गहने, नकदी और मिष्ठान्न की वह भेंट है जो मामा अपनी बहन के पुत्र या पुत्री के विवाह पर लाता है, और उसे लाने की रस्म, भात भरना, स्वयं एक आयोजन है, जिसमें घर मामा के परिवार का स्वागत और सम्मान करता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हरियाणा में तीज पर्व से विशेष रूप से कौन सा मिष्ठान्न जुड़ा है?
- A.घेवर
- B.अलसी की पिन्नी
- C.गोंद के लड्डू
- D.चूरमा
उत्तर देखें
चाशनी में डूबी तली हुई घेवर की टिकिया सावन की हरियाली तीज का मिष्ठान्न है, जब पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं, विवाहित बेटी को मायके से नए वस्त्र तथा मिठाइयाँ मिलती हैं और घर की स्त्रियाँ तीज के गीत गाती हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मोटा दोहरी बुनाई वाला सूती ओढ़ना खेस सबसे अधिक हरियाणा के किस नगर से जुड़ा है?
- A.पानीपत
- B.रेवाड़ी
- C.कुरुक्षेत्र
- D.सिरसा
उत्तर देखें
पानीपत हरियाणा का वस्त्र नगर है और खेस का सबसे प्रसिद्ध केंद्र, अर्थात उस मोटे दोहरी बुनाई वाले सूती ओढ़ने का, जो शाल तथा चादर दोनों रूप में प्रयुक्त होता है; साथ ही यह गड्ढा करघे पर बुनी पंजा दरी और गृह सज्जा के बड़े व्यापार का केंद्र भी है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हंसली हरियाणा का पारंपरिक गहना शरीर के किस अंग पर पहना जाता है?
- A.कलाई पर
- B.गले पर
- C.पैर की उँगलियों पर
- D.बाँह के ऊपरी भाग पर
उत्तर देखें
हंसली हरियाणवी स्त्री के गले का भारी चाँदी का कड़ा है, जो कंठी, गलसरी और हमेल के साथ पहना जाता है, और लोकगीतों तथा सांग के मंचन में आज भी इसे वधू की पहचान बताया जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हरियाणा का पारंपरिक मिष्ठान्न अलसी की पिन्नी मुख्यत: किस सामग्री से बनती है और किस ऋतु में खाई जाती है?
- A.बेसन से, वर्षा ऋतु में
- B.अलसी से, जाड़े में
- C.चावल से, होली पर
- D.बाजरे से, गर्मी में
उत्तर देखें
अलसी की पिन्नी पिसी अलसी को गेहूँ के आटे, घी और गुड़ या चीनी के साथ भूनकर लड्डू का रूप देकर बनाई जाती है; इसे जाड़े के महीनों में खाया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि यह गर्मी और बल देती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हरियाणा में भादों मास में मनाई जाने वाली गुग्गा नौमी किस देवता को समर्पित है?
- A.नाग देवता गुग्गा पीर को
- B.सूर्य को
- C.गाँव की देवी माता को
- D.वर्षा के देवता इंद्र को
उत्तर देखें
गुग्गा नौमी भादों मास में पड़ती है और गुग्गा पीर को समर्पित है, जिन्हें नागों का स्वामी और सर्पदंश से रक्षक माना जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →नवरात्र में हरियाणा की लड़कियों द्वारा बनाई जाने वाली सांझी का सबसे सही वर्णन क्या है?
- A.पेड़ पर डाला गया झूला
- B.आँगन की दीवार पर गढ़ी देवी की आकृति
- C.स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला विवाह गीत
- D.गुड़ से बना मिष्ठान्न
उत्तर देखें
नवरात्र की नौ रातों में हरियाणवी घर की अविवाहित लड़कियाँ आँगन या द्वार की दीवार पर मिट्टी और गोबर से देवी की आकृति सांझी गढ़ती हैं, उसे काँच, चूड़ियों और रंगों से सजाती हैं, प्रतिदिन संध्या को उसके गीत गाती हैं और पर्व के अंत में जुलूस के साथ उसे…
पूरी व्याख्या पढ़ें →हरियाणा के पारंपरिक ग्रामीण भोजन का मुख्य अनाज कौन है, जो रोटी और खिचड़ी के रूप में खाया जाता है?
- A.बाजरा
- B.रागी
- C.ज्वार
- D.मक्का
उत्तर देखें
शुष्क दक्षिण-पश्चिमी जिलों का बाजरा पारंपरिक हरियाणवी रसोई का अनाज है: रोज़ की रोटी बाजरे या गेहूँ की बनती है, बाजरे की खिचड़ी तथा बाजरा आलू रोटी सामान्य व्यंजन हैं, और गर्मी के महीनों में बाजरे की राबड़ी पी जाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हरियाणवी स्त्री की पारंपरिक पोशाक क्या है?
दामन, अर्थात चुन्नटों वाला लंबा घाघरा, उसके साथ ऊपरी वस्त्र के रूप में कुर्ती या अंगी, और सिर तथा कंधे पर डाली जाने वाली चुंदर या ओढ़नी। कुछ जिलों में दामन के स्थान पर घाघरी पहनी जाती है।
करेवा प्रथा क्या है?
पति की मृत्यु के बाद विधवा का उसके छोटे भाई से पुनर्विवाह, जिसे स्त्री पर डाली जाने वाली चादर के कारण चादर डालना या चादर अंदाजी भी कहा जाता है। इससे मृतक की ज़मीन और संतान उसी घर में रहती थी।
हरियाणवी विवाह में भात कौन लाता है?
माँ का भाई अर्थात मामा अपनी बहन के पुत्र या पुत्री के लिए वस्त्र, गहने, नकदी और मिष्ठान्न लाता है। इस रस्म को भात भरना कहा जाता है और घर मामा के परिवार का सम्मान करता है।
हरियाणा में गले और टखने पर कौन से गहने पहने जाते हैं?
गले में हंसली, कंठी, गलसरी और हमेल पहने जाते हैं; टखने में पाजेब तथा कड़े और उँगलियों में बिछुआ। अधिकांश गहने सोने के बजाय चाँदी के बनते थे।
हरियाणा के प्रसिद्ध व्यंजन कौन से हैं?
बाजरे की खिचड़ी और बाजरा आलू रोटी, बेसन मसाला रोटी, हरा चोलिया, बथुआ रायता, कचरी की चटनी और पकौड़ों वाली गाढ़ी कढ़ी; तीज पर घेवर तथा जाड़े में अलसी की पिन्नी और गोंद के लड्डू।
गुग्गा नौमी क्या है?
भादों मास का पर्व, जो नाग देवता और सर्पदंश से रक्षक गुग्गा पीर को समर्पित है। उनकी सजी छड़ी घर-घर ले जाई जाती है और उनके स्थानों पर, जिन्हें मड़ी कहते हैं, मेले लगते हैं।
स्रोत
- हरियाणा की संस्कृति, रीति-रिवाज, मेले और पर्व — हरियाणा सरकार
- भारत की लोक संस्कृति, वेशभूषा और शिल्प परंपराएँ — संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
- भारत के हथकरघा क्लस्टर और पारंपरिक बुनाई — विकास आयुक्त (हथकरघा) कार्यालय, वस्त्र मंत्रालय





