उत्तर प्रदेश की भाषा और साहित्य: बोलियाँ और साहित्यकार
यूपीपीएससी और एसएससी परीक्षाओं के लिए उत्तर प्रदेश की भाषा और साहित्य के नोट्स: हिंदी तथा उर्दू, जिलेवार बोलियाँ और राज्य के प्रमुख साहित्यकार।
लेखक GK24 Editorial Team· प्रकाशित · 5 मिनट

उत्तर प्रदेश हिंदी का हृदय क्षेत्र है और हिंदी साहित्य के इतिहास का बड़ा भाग इसी भूमि पर लिखा गया। खड़ी बोली, जिससे मानक हिंदी बनी, इसी राज्य की देन है; ब्रजभाषा और अवधी में उत्तर भारत की सर्वश्रेष्ठ भक्ति कविता रची गई; और पूर्वी जिलों में करोड़ों लोग भोजपुरी बोलते हैं। परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय तीन भागों में बँटता है: राजभाषा की स्थिति, जिलेवार बोलियों का नक्शा, और कबीर-तुलसीदास से लेकर आज के ज्ञानपीठ विजेताओं तक के साहित्यकार।
राजभाषा की स्थिति
उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1951 के अंतर्गत देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी राज्य की राजभाषा है। वर्ष 1989 के संशोधन द्वारा उर्दू को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया और इसके लिए अलग उर्दू अकादमी कार्य करती है। संघ के स्तर पर संविधान का अनुच्छेद 343 देवनागरी में लिखी हिंदी को संघ की राजभाषा बनाता है; संविधान सभा ने यह निर्णय 14 सितंबर 1949 को लिया था, इसीलिए 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। ध्यान रखें कि हिंदी और उर्दू आठवीं अनुसूची में सम्मिलित हैं, जबकि अवधी, ब्रज और भोजपुरी जनगणना में हिंदी के अंतर्गत गिनी जाती हैं और बोली मानी जाती हैं, अनुसूचित भाषा नहीं।
उत्तर प्रदेश का बोली-नक्शा
राज्य की सभी बोलियाँ भारोपीय परिवार की भारतीय-आर्य शाखा की हैं। पश्चिमी बोलियाँ शौरसेनी अपभ्रंश से निकली हैं और पश्चिमी हिंदी वर्ग बनाती हैं; अवधी तथा बघेली अर्धमागधी अपभ्रंश से निकलकर पूर्वी हिंदी वर्ग बनाती हैं; भोजपुरी मागधी अपभ्रंश से निकली है और बिहारी वर्ग में रखी जाती है। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने इन सबका लेखा भारतीय भाषा सर्वेक्षण में किया।
| बोली | वर्ग | प्रमुख क्षेत्र |
|---|---|---|
| खड़ी बोली (कौरवी) | पश्चिमी हिंदी | ऊपरी दोआब: मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर |
| ब्रजभाषा | पश्चिमी हिंदी | ब्रज: मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस, एटा |
| कन्नौजी | पश्चिमी हिंदी | कन्नौज, फर्रुखाबाद, कानपुर, इटावा |
| बुंदेली | पश्चिमी हिंदी | बुंदेलखंड: झाँसी, जालौन, हमीरपुर, बांदा |
| अवधी | पूर्वी हिंदी | अवध: लखनऊ, अयोध्या, सीतापुर, बाराबंकी, प्रयागराज |
| बघेली | पूर्वी हिंदी | चित्रकूट और बांदा की दक्षिणी पट्टी |
| भोजपुरी | बिहारी वर्ग | पूर्वांचल: वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, आजमगढ़, देवरिया |
मानक हिंदी खड़ी बोली का परिष्कृत रूप है। ब्रज और अवधी ने उन्नीसवीं शताब्दी में साहित्य की भाषा का स्थान खड़ी बोली को सौंप दिया, परंतु भक्तिकाल की जिस कविता पर प्रश्न बनते हैं वह इन्हीं दो बोलियों में है।
भक्तिकाल और रीतिकाल के कवि
कबीर काशी में रहे और मगहर में उनका देहावसान हुआ, जिस जिले का नाम आज संत कबीर नगर है। वे निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं; उनकी वाणी बीजक नाम से साखी, सबद और रमैनी तीन भागों में संग्रहीत है और उनकी मिली-जुली भाषा सधुक्कड़ी कहलाती है। संत रविदास भी वाराणसी के थे, उसी निर्गुण धारा के और उनके पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। सगुण धारा में सूरदास ने ब्रजभाषा में सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी लिखी और वे वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के अष्टछाप के प्रमुख कवि थे। तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की, जिसका आरंभ 1574 में अयोध्या में हुआ; विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली और हनुमान चालीसा भी उनकी हैं और अंतिम वर्ष उन्होंने वाराणसी में बिताए। अमेठी के जायस के मलिक मुहम्मद जायसी ने 1540 में पद्मावत लिखी, जो अवधी का सर्वश्रेष्ठ सूफी प्रेमाख्यान है। हरदोई के पिहानी में जन्मे रसखान ने ब्रज में कृष्ण भक्ति के पद लिखे और उनकी समाधि गोकुल के पास महावन में है। रीतिकाल में कानपुर जिले के टिकवापुर के भूषण ने शिवराज भूषण और शिवाबावनी में शिवाजी तथा छत्रसाल की प्रशंसा की; उनके भाई चिंतामणि और मतिराम रीति-ग्रंथों के रचनाकार थे, और घनानंद ने रीतिमुक्त प्रेम कविता लिखी।
आधुनिक काल: भारतेंदु से ज्ञानपीठ तक
वाराणसी के भारतेंदु हरिश्चंद्र, जिनका जीवनकाल 1850 से 1885 तक रहा, आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच के जनक कहे जाते हैं; उन्होंने कविवचन सुधा तथा हरिश्चंद्र मैगज़ीन का संपादन किया और अंधेर नगरी एवं भारत दुर्दशा नाटक लिखे। रायबरेली के दौलतपुर के महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन करते हुए खड़ी बोली को काव्य की भाषा बनाया, इसलिए इस युग को द्विवेदी युग कहते हैं। बस्ती जिले के आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा, जो काल-विभाजन का मानक ग्रंथ है। वाराणसी के लमही में जन्मे धनपत राय अर्थात मुंशी प्रेमचंद हिंदी के उपन्यास सम्राट हैं; गोदान, निर्मला, गबन, रंगभूमि, सेवासदन और कफ़न उनकी रचनाएँ हैं, और उनका उर्दू संग्रह सोज़-ए-वतन अंग्रेज़ी शासन ने ज़ब्त कर लिया था। वाराणसी के जयशंकर प्रसाद ने कामायनी तथा चंद्रगुप्त और स्कंदगुप्त नाटक लिखे; उन्नाव के गढ़ाकोला से जुड़े सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और 1907 में फर्रुखाबाद में जन्मी महादेवी वर्मा के साथ वे छायावाद के स्तंभ हैं। राज्य के परवर्ती लेखकों को ज्ञानपीठ मिला: 1969 में फ़िराक़ गोरखपुरी को उर्दू संग्रह गुल-ए-नग़्मा पर, 1978 में अज्ञेय को, 1982 में महादेवी वर्मा को यामा पर, 2005 में कुँवर नारायण को, 2009 में अमरकांत तथा श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रूप से और 2013 में केदारनाथ सिंह को।
उर्दू, संस्कृत और राज्य की अकादमियाँ
दिल्ली के साथ लखनऊ उर्दू शायरी के दो बड़े दबिस्तानों में एक है; आगरा ने उर्दू को मीर तक़ी मीर और नज़ीर अकबराबादी दिए और मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म भी 1797 में वहीं हुआ। जोश मलीहाबादी, आजमगढ़ के कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी और बदायूँ की इस्मत चुग़ताई इसी राज्य के हैं। संस्कृत के लिए वाराणसी का संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय 1791 में स्थापित संस्कृत कॉलेज से विकसित हुआ। देवनागरी के प्रचार के लिए नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 1893 में वाराणसी में और हिंदी साहित्य सम्मेलन की 1910 में प्रयागराज में हुई; राज्य सरकार ने 1975 में लखनऊ में भारतेंदु नाट्य अकादमी और 1976 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान बनाया, जिसका सर्वोच्च सम्मान भारत भारती सम्मान है।
परीक्षा की दृष्टि से
यूपीपीएससी, यूपीएसएसएससी, यूपी पुलिस और एसएससी के प्रश्नपत्र इस अध्याय से तीन बातें पूछते हैं। पहली, राजभाषा की स्थिति: 1951 से हिंदी और 1989 से द्वितीय राजभाषा उर्दू, जिसमें विकल्पों में पंजाबी या संस्कृत देकर भ्रम पैदा किया जाता है। दूसरी, बोलियों का नक्शा, जिसमें जिला या क्षेत्र देकर बोली पूछी जाती है, और भोजपुरी का वर्गीकरण, जो पूर्वी हिंदी में नहीं बल्कि बिहारी वर्ग में है। तीसरी, रचनाकार और रचना की जोड़ियाँ: रामचरितमानस के साथ अवधी, पद्मावत के साथ जायसी, कामायनी के साथ जयशंकर प्रसाद, यामा के साथ महादेवी वर्मा और गुल-ए-नग़्मा के साथ फ़िराक़ गोरखपुरी, साथ ही जन्मस्थान के जिले तथा नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन और राज्य अकादमियों के स्थापना वर्ष।
महत्वपूर्ण तथ्य
| राजभाषा | देवनागरी में हिंदी, उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1951 |
|---|---|
| द्वितीय राजभाषा | उर्दू, यह दर्जा 1989 में मिला |
| हिंदी दिवस | 14 सितंबर, 1949 में संविधान सभा द्वारा हिंदी स्वीकार करने का दिन |
| मानक हिंदी का आधार | ऊपरी दोआब की खड़ी बोली या कौरवी |
| ब्रजभाषा क्षेत्र | मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस, एटा |
| अवधी क्षेत्र | लखनऊ, अयोध्या, सीतापुर, बाराबंकी, प्रयागराज |
| भोजपुरी क्षेत्र | वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, आजमगढ़, देवरिया |
| रामचरितमानस | तुलसीदास, अवधी में, आरंभ 1574 में अयोध्या में |
| पद्मावत | जायस के मलिक मुहम्मद जायसी, 1540, अवधी में |
| कबीर | काशी; बीजक में साखी, सबद और रमैनी; मगहर में निधन |
| आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक | भारतेंदु हरिश्चंद्र, वाराणसी, 1850 से 1885 |
| प्रेमचंद | जन्म लमही, वाराणसी; गोदान, निर्मला, गबन, कफ़न |
| कामायनी | वाराणसी के जयशंकर प्रसाद, छायावादी कृति |
| ज्ञानपीठ 1982 | महादेवी वर्मा, यामा पर |
| ज्ञानपीठ 1969 | फ़िराक़ गोरखपुरी, गुल-ए-नग़्मा पर, पहले उर्दू साहित्यकार |
| नागरी प्रचारिणी सभा | वाराणसी, स्थापना 1893 |
| हिंदी साहित्य सम्मेलन | प्रयागराज, स्थापना 1910 |
| लखनऊ की संस्थाएँ | भारतेंदु नाट्य अकादमी, 1975; उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 1976 |
इस टॉपिक पर अभ्यास MCQ
वर्ष 1989 में उत्तर प्रदेश की द्वितीय राजभाषा का दर्जा किस भाषा को दिया गया?
- A.पंजाबी
- B.उर्दू
- C.भोजपुरी
- D.संस्कृत
उत्तर देखें
उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1951 के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी राज्य की राजभाषा है और 1989 में पारित संशोधन ने उर्दू को राज्य की द्वितीय राजभाषा बनाया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →तुलसीदास की रामचरितमानस किस बोली में रची गई है?
- A.ब्रजभाषा
- B.अवधी
- C.बुंदेली
- D.खड़ी बोली
उत्तर देखें
तुलसीदास ने रामचरितमानस अवधी में लिखी, जो अयोध्या के आसपास के अवध क्षेत्र की पूर्वी हिंदी बोली है, और इसका आरंभ 1574 में अयोध्या में हुआ।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अवधी का सूफी प्रेमाख्यान पद्मावत उत्तर प्रदेश के किस कवि ने लिखा?
- A.कबीर
- B.मलिक मुहम्मद जायसी
- C.रसखान
- D.घनानंद
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जायसी वर्तमान अमेठी जिले के जायस के थे और उन्होंने 1540 में पद्मावत पूरी की।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ब्रजभाषा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के किस भाग में बोली जाती है?
- A.वाराणसी और गोरखपुर के आसपास का पूर्वांचल
- B.मथुरा, आगरा और अलीगढ़ क्षेत्र
- C.झाँसी के आसपास का बुंदेलखंड
- D.लखनऊ के आसपास का अवध
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ब्रजभाषा ब्रज क्षेत्र की बोली है, जिसमें मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस और एटा आते हैं, और यह शौरसेनी अपभ्रंश से निकले पश्चिमी हिंदी वर्ग की बोली है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →पूर्वी उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली भोजपुरी भारतीय-आर्य भाषाओं के किस वर्ग में रखी जाती है?
- A.पश्चिमी हिंदी
- B.पूर्वी हिंदी
- C.बिहारी वर्ग
- D.पहाड़ी वर्ग
उत्तर देखें
भोजपुरी मागधी अपभ्रंश से विकसित हुई है और मगही तथा मैथिली के साथ पूर्वी भारतीय-आर्य परिवार के बिहारी वर्ग में रखी जाती है; यह वर्गीकरण जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने भारतीय भाषा सर्वेक्षण में किया था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →हिंदी के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म किस स्थान पर हुआ था?
- A.वाराणसी का लमही
- B.रायबरेली का दौलतपुर
- C.उन्नाव का गढ़ाकोला
- D.अमेठी का जायस
उत्तर देखें
प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था और उनका जन्म 1880 में वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ, निधन 1936 में हुआ।
पूरी व्याख्या पढ़ें →छायावाद का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रबंध काव्य कामायनी किसने लिखा?
- A.सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
- B.जयशंकर प्रसाद
- C.महादेवी वर्मा
- D.हरिवंश राय बच्चन
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प्रसाद वाराणसी में 1889 से 1937 तक रहे और उन्होंने 1936 में कामायनी प्रकाशित की; इसमें मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा के माध्यम से भावना और बुद्धि का रूपक रचा गया है और यह छायावाद का प्रमुख प्रबंध काव्य माना जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →महादेवी वर्मा को 1982 का ज्ञानपीठ पुरस्कार किस कृति पर मिला?
- A.नीरजा
- B.यामा
- C.दीपशिखा
- D.सांध्यगीत
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1907 में फर्रुखाबाद में जन्मी महादेवी वर्मा को 1982 में यामा पर ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया, जो उनके गीतों का संकलन है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →देवनागरी लिपि के प्रचार के लिए 1893 में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा किस नगर में है?
- A.प्रयागराज
- B.लखनऊ
- C.वाराणसी
- D.आगरा
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नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 1893 में वाराणसी में क्वींस कॉलेज के विद्यार्थियों ने की थी, जिसका उद्देश्य न्यायालयों और कार्यालयों में देवनागरी तथा हिंदी का प्रयोग कराना था; आगे चलकर इसने कोश, हस्तलिखित ग्रंथ और हिंदी शब्दसागर प्रकाशित किए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले पहले उर्दू साहित्यकार फ़िराक़ गोरखपुरी को 1969 में किस संग्रह पर यह सम्मान मिला?
- A.गुल-ए-नग़्मा
- B.सोज़-ए-वतन
- C.शेखर: एक जीवनी
- D.राग दरबारी
उत्तर देखें
फ़िराक़ गोरखपुरी का वास्तविक नाम रघुपति सहाय था, उनका जन्म 1896 में गोरखपुर में हुआ और 1969 में उर्दू संग्रह गुल-ए-नग़्मा पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, जिससे वे यह पुरस्कार पाने वाले पहले उर्दू साहित्यकार बने।
पूरी व्याख्या पढ़ें →कानपुर जिले के टिकवापुर में जन्मे किस रीतिकालीन कवि ने शिवराज भूषण और शिवाबावनी लिखी?
- A.बिहारी
- B.भूषण
- C.देव
- D.मतिराम
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भूषण वर्तमान कानपुर जिले के टिकवापुर के थे और उन्होंने ब्रजभाषा में शिवराज भूषण, शिवाबावनी तथा छत्रसाल दशक लिखकर शिवाजी और छत्रसाल बुंदेला की वीर रस में प्रशंसा की, उस समय जब अधिकांश रीतिकालीन कवि दरबारों के लिए शृंगार की कविता लिख रहे थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उत्तर प्रदेश की राजभाषा कौन सी है?
उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम, 1951 के अंतर्गत देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी राज्य की राजभाषा है। वर्ष 1989 में उर्दू को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया।
उत्तर प्रदेश में कौन-कौन सी बोलियाँ बोली जाती हैं?
राज्य में सात प्रमुख बोलियाँ हैं: पश्चिमी हिंदी वर्ग की खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली; पूर्वी हिंदी वर्ग की अवधी और बघेली; तथा भोजपुरी, जो पूर्वी भारतीय-आर्य के बिहारी वर्ग में आती है।
रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई है?
अवधी में, जो अवध क्षेत्र की बोली है। तुलसीदास ने इसका आरंभ 1574 में अयोध्या में किया, जबकि उनकी विनय पत्रिका और कवितावली ब्रजभाषा में हैं।
उत्तर प्रदेश के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कौन हैं?
इनमें 1969 में फ़िराक़ गोरखपुरी, 1978 में अज्ञेय, 1982 में महादेवी वर्मा, 2005 में कुँवर नारायण, 2009 में संयुक्त रूप से अमरकांत तथा श्रीलाल शुक्ल और 2013 में केदारनाथ सिंह सम्मिलित हैं।
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक क्यों कहा जाता है?
क्योंकि 1868 से 1885 के बीच उन्होंने हिंदी गद्य, नाटक और पत्रकारिता को आधुनिक रूप दिया; उन्होंने कविवचन सुधा तथा हरिश्चंद्र मैगज़ीन का संपादन किया और अंधेर नगरी एवं भारत दुर्दशा जैसे नाटक लिखे।
नागरी प्रचारिणी सभा किस नगर में स्थित है?
वाराणसी में, जहाँ 1893 में देवनागरी लिपि और हिंदी के प्रचार के लिए इसकी स्थापना हुई; 1910 में स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयागराज में है।
स्रोत
- भारतीय भाषा सर्वेक्षण और भारतीय भाषाओं का वर्गीकरण — भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय
- उत्तर प्रदेश की राजभाषा, राज्य अकादमियाँ और सांस्कृतिक संस्थाएँ — उत्तर प्रदेश सरकार
- भारतीय भाषाएँ, आठवीं अनुसूची और साहित्यिक संस्थाएँ — संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार





