सीईएनएस बेंगलुरु ने पेप्टाइड से पीजोइलेक्ट्रिक जैवसामग्री बनाई
सीईएनएस बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने एक प्रतिशत सह-विलायक मिलाकर पेप्टाइड में मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया पैदा की, जो स्व-संचालित इम्प्लांट का रास्ता खोलती है।

चर्चा में क्यों
3 सितंबर 2026 को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया कि सीईएनएस बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने आईआईएसईआर कोलकाता तथा जेएनसीएएसआर के साथ अणुओं के संयोजन को नियंत्रित करके पेप्टाइड को मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक बनाया।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 3 सितंबर 2026 को बताया कि भारतीय शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड से बेहद असरदार पीजोइलेक्ट्रिक जैवसामग्री बनाने का एक सरल आणविक तरीका खोजा है। पेप्टाइड प्रोटीन के प्राकृतिक बिल्डिंग ब्लॉक होते हैं। इस खोज से शरीर के अंदर लगने वाले ऐसे उपकरण बन सकते हैं जो दिल की धड़कन, सांस या चलने-फिरने से अपनी बिजली खुद बनाएं।
पीजोइलेक्ट्रिसिटी क्या है
पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री यांत्रिक बल को विद्युत ऊर्जा में बदलती है। ऐसी सामग्री को दबाने, मोड़ने या खींचने से वोल्टेज पैदा होता है। इस गुण का उपयोग प्रेशर सेंसर, चिकित्सीय अल्ट्रासाउंड मशीन, एक्चुएटर और ऊर्जा संचयन प्रणालियों में होता है। बाजार में मिलने वाली लगभग सभी पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री सिरेमिक से बनी होती है। सिरेमिक अच्छा काम करता है, पर वह आसानी से टूटता है, पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है और आम तौर पर मानव शरीर के अंदर उपयोग के लायक नहीं होता। इसलिए वैज्ञानिक नरम और जैव अनुकूल विकल्प खोज रहे थे।
शोध किसने किया
यह शोध सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस), बेंगलुरु में हुआ, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का स्वायत्त संस्थान है। यह कोलकाता स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) तथा बेंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर) के साथ मिलकर किया गया। सीईएनएस के डॉ. गौतम घोष ने अपनी पीएचडी स्कॉलर अपर्णा रमेश के साथ इसका नेतृत्व किया।
कौन सी तरकीब काम आई
दल ने पाया कि पेप्टाइड को स्वयं बदलने की जरूरत नहीं है। असली बात यह है कि पेप्टाइड अणु किस तरह व्यवस्थित होते हैं। एटॉमिक फोर्स माइक्रोस्कोपी और फील्ड एमिशन स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से उन्होंने देखा कि ये अणु पानी में नैनोफाइबर बनाते हैं और कोई पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाते। उपयुक्त सह-विलायक का केवल एक प्रतिशत मिलाने से वे एक अत्यधिक व्यवस्थित सुपरमॉलिक्यूलर संरचना में पुनर्गठित हो गए। मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया तुरंत शुरू हो गई और पेप्टाइड की रासायनिक संरचना में कोई बदलाव नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि नियंत्रित काइरल स्व-संयोजन आणविक द्विध्रुवों को गैर-केंद्रसममितीय संरचना में संरेखित कर देता है, जो पीजोइलेक्ट्रिसिटी की मूलभूत संरचनात्मक शर्त है।
एक नजर में
| प्रमुख संस्थान | सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु |
| मूल विभाग | विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग |
| सहयोगी संस्थान | आईआईएसईआर कोलकाता और जेएनसीएएसआर बेंगलुरु |
| प्रयुक्त सामग्री | पेप्टाइड, प्रोटीन के बिल्डिंग ब्लॉक |
| मिलाया गया सह-विलायक | एक प्रतिशत |
| पीजोइलेक्ट्रिक गुणांक | लगभग 30 पीएम प्रति वोल्ट |
| शोध पत्रिका | एंजवेन्टे केमी इंटरनेशनल एडिशन |
तैयार किए गए पेप्टाइड नैनोमटीरियल ने लगभग 30 पीएम प्रति वोल्ट का पीजोइलेक्ट्रिक गुणांक दिखाया, जो पेप्टाइड आधारित सामग्री के लिए उल्लेखनीय है। यह खोज एंजवेन्टे केमी इंटरनेशनल एडिशन में प्रकाशित हुई। यह अणुओं में रासायनिक बदलाव किए बिना टिकाऊ और उपयोगी जैवसामग्री बनाने का खाका देती है। ऐसी सामग्री शरीर की गतिविधियों से ऊर्जा लेकर पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक्स, शरीर के अंदर लगने वाले सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक स्किन और बायो-सेंसर चला सकती है। यह पारंपरिक पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री का पर्यावरण अनुकूल विकल्प भी देती है। विज्ञप्ति के अनुसार यह शोध सुप्रामॉलिक्यूलर केमिस्ट्री में भारत की बढ़ती ताकत दिखाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| प्रमुख संस्थान | सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस), बेंगलुरु |
|---|---|
| मूल विभाग | विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग |
| सहयोगी संस्थान | आईआईएसईआर कोलकाता और जेएनसीएएसआर, बेंगलुरु |
| नेतृत्व | डॉ. गौतम घोष, पीएचडी स्कॉलर अपर्णा रमेश के साथ |
| प्रयुक्त सामग्री | पेप्टाइड, प्रोटीन के प्राकृतिक बिल्डिंग ब्लॉक |
| मुख्य हस्तक्षेप | उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाना |
| संरचनात्मक शर्त | काइरल स्व-संयोजन से बनी गैर-केंद्रसममितीय संरचना |
| उपयोग की गई माइक्रोस्कोपी | एटॉमिक फोर्स और फील्ड एमिशन स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी |
| पीजोइलेक्ट्रिक गुणांक | लगभग 30 पीएम प्रति वोल्ट |
| शोध पत्रिका | एंजवेन्टे केमी इंटरनेशनल एडिशन |
परीक्षा की दृष्टि से
प्रमुख संस्थान (सीईएनएस बेंगलुरु, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत), सहयोगी (आईआईएसईआर कोलकाता और जेएनसीएएसआर), सामग्री (पेप्टाइड), तरकीब (एक प्रतिशत सह-विलायक), गैर-केंद्रसममितीय संरचना शब्द, लगभग 30 पीएम प्रति वोल्ट का गुणांक और शोध पत्रिका याद रखें।
अभ्यास प्रश्न
पेप्टाइड को मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक बनाने वाले शोध का नेतृत्व किस संस्थान ने किया?
- A.सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु
- B.भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, कोलकाता
- C.जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च
- D.भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु
व्याख्या
सही उत्तर सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु है, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। विज्ञप्ति इसी संस्थान को बताती है जिसके शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड पर ध्यान केंद्रित किया, और वहां डॉ. गौतम घोष ने अपनी पीएचडी स्कॉलर अपर्णा रमेश के साथ इस काम का नेतृत्व किया। विकल्प ख और ग सहयोगी संस्थान हैं और इसीलिए सबसे तेज भ्रम पैदा करते हैं। आईआईएसईआर कोलकाता तथा जेएनसीएएसआर बेंगलुरु दोनों ने योगदान दिया और दोनों के शोधकर्ताओं का नाम है, पर नेतृत्व किसी ने नहीं किया। विकल्प घ का विज्ञप्ति में कोई उल्लेख नहीं है। छात्रों को संस्थान के साथ उसका मूल विभाग भी याद रखना चाहिए, क्योंकि समाचार में आए किसी शोध संस्थान का विभाग पूछा जाता है। यह भी ध्यान रखें कि खोज एंजवेन्टे केमी इंटरनेशनल एडिशन में प्रकाशित हुई।
शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड सामग्री में मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया कैसे शुरू की?
- A.पेप्टाइड की रासायनिक संरचना बदलकर
- B.उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाकर
- C.पेप्टाइड पर सिरेमिक की परत चढ़ाकर
- D.पेप्टाइड को 500 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म करके
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाकर
व्याख्या
सही उत्तर उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाकर है। दल ने पाया कि पानी में पेप्टाइड अणु नैनोफाइबर बनाते हैं और कोई पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाते। सह-विलायक की इतनी छोटी मात्रा मिलाने से अणु एक अत्यधिक व्यवस्थित सुपरमॉलिक्यूलर संरचना में पुनर्गठित हो गए और प्रतिक्रिया तुरंत शुरू हो गई। विकल्प क ठीक वही है जो इस शोध में नहीं किया गया, और विज्ञप्ति इस बात पर जोर देती है कि पेप्टाइड की रासायनिक संरचना अछूती रही तथा असली कुंजी अणुओं के संयोजन को नियंत्रित करने में थी। विकल्प ग उद्देश्य को ही हरा देता, क्योंकि लक्ष्य टूटने वाले सिरेमिक की जगह नरम और जैव अनुकूल सामग्री लाना था। विकल्प घ गढ़ा हुआ है। इस बदलाव का भौतिक कारण याद रखें, क्योंकि नियंत्रित काइरल स्व-संयोजन आणविक द्विध्रुवों को गैर-केंद्रसममितीय संरचना में संरेखित करता है।
शोध के अनुसार पीजोइलेक्ट्रिसिटी के लिए मूलभूत संरचनात्मक शर्त कौन सी है?
- A.केंद्रसममितीय क्रिस्टल संरचना
- B.बिना किसी क्रम वाली अक्रिस्टलीय संरचना
- C.गैर-केंद्रसममितीय संरचना
- D.अंतःकेंद्रित घनीय संरचना
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. गैर-केंद्रसममितीय संरचना
व्याख्या
सही उत्तर गैर-केंद्रसममितीय संरचना है। विज्ञप्ति बताती है कि नियंत्रित काइरल स्व-संयोजन आणविक द्विध्रुवों को ऐसी ही संरचना में संरेखित करता है और इसे पीजोइलेक्ट्रिसिटी की मूलभूत संरचनात्मक आवश्यकता कहती है। विकल्प क ठीक उलटी बात कहता है और जल्दबाजी में पढ़ने वाला छात्र इसे चुन लेता है, क्योंकि दोनों शब्दों में केवल एक उपसर्ग का अंतर है। केंद्रसममितीय व्यवस्था में द्विध्रुव आपस में कट जाते हैं और कोई पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं मिलती। विकल्प ख गलत है, क्योंकि सामग्री का प्रदर्शन अत्यधिक व्यवस्थित सुपरमॉलिक्यूलर संरचना से आया, अव्यवस्था से नहीं। विकल्प घ सामान्य रसायन विज्ञान की एक क्रिस्टल जालक संरचना है, जिसका यहां उल्लेख नहीं है। इस शब्द के साथ व्यावहारिक परिणाम भी जोड़ें, क्योंकि तैयार पेप्टाइड नैनोमटीरियल ने लगभग 30 पीएम प्रति वोल्ट का गुणांक दिखाया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री क्या होती है?
वह सामग्री जो दबाने, मोड़ने या खींचने जैसे यांत्रिक बल को विद्युत ऊर्जा में बदल देती है। ऐसी सामग्री का उपयोग प्रेशर सेंसर, चिकित्सीय अल्ट्रासाउंड उपकरण, एक्चुएटर और स्व-संचालित ऊर्जा संचयन प्रणालियों में होता है।
पेप्टाइड पीजोइलेक्ट्रिक शोध का नेतृत्व किस संस्थान ने किया?
बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस) ने, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का स्वायत्त संस्थान है। इसमें आईआईएसईआर कोलकाता और जेएनसीएएसआर बेंगलुरु का सहयोग रहा।
पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया कैसे शुरू हुई?
उपयुक्त सह-विलायक का केवल एक प्रतिशत मिलाने से, जिससे पेप्टाइड अणु अत्यधिक व्यवस्थित सुपरमॉलिक्यूलर संरचना में पुनर्गठित हो गए। पेप्टाइड की रासायनिक संरचना में कोई बदलाव नहीं किया गया।
इम्प्लांट के लिए सिरेमिक उपयुक्त क्यों नहीं है?
बाजार की अधिकांश पीजोइलेक्ट्रिक सामग्री सिरेमिक से बनी होती है और अच्छा काम करने के बावजूद वह आसानी से टूटती है, पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है तथा मानव शरीर के अंदर उपयोग के लायक नहीं होती। इसी कारण जैव अनुकूल विकल्प खोजे जा रहे हैं।
स्रोत
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