शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड सामग्री में मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया कैसे शुरू की?
- A.पेप्टाइड की रासायनिक संरचना बदलकर
- B.उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाकर
- C.पेप्टाइड पर सिरेमिक की परत चढ़ाकर
- D.पेप्टाइड को 500 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म करके
सही उत्तर
B. उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाकर
व्याख्या
सही उत्तर उपयुक्त सह-विलायक का एक प्रतिशत मिलाकर है। दल ने पाया कि पानी में पेप्टाइड अणु नैनोफाइबर बनाते हैं और कोई पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाते। सह-विलायक की इतनी छोटी मात्रा मिलाने से अणु एक अत्यधिक व्यवस्थित सुपरमॉलिक्यूलर संरचना में पुनर्गठित हो गए और प्रतिक्रिया तुरंत शुरू हो गई। विकल्प क ठीक वही है जो इस शोध में नहीं किया गया, और विज्ञप्ति इस बात पर जोर देती है कि पेप्टाइड की रासायनिक संरचना अछूती रही तथा असली कुंजी अणुओं के संयोजन को नियंत्रित करने में थी। विकल्प ग उद्देश्य को ही हरा देता, क्योंकि लक्ष्य टूटने वाले सिरेमिक की जगह नरम और जैव अनुकूल सामग्री लाना था। विकल्प घ गढ़ा हुआ है। इस बदलाव का भौतिक कारण याद रखें, क्योंकि नियंत्रित काइरल स्व-संयोजन आणविक द्विध्रुवों को गैर-केंद्रसममितीय संरचना में संरेखित करता है।
पूरा लेख पढ़ें: सीईएनएस बेंगलुरु ने पेप्टाइड से पीजोइलेक्ट्रिक जैवसामग्री बनाई
अभ्यास प्रश्न
पेप्टाइड को मजबूत पीजोइलेक्ट्रिक बनाने वाले शोध का नेतृत्व किस संस्थान ने किया?
- A.सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु
- B.भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, कोलकाता
- C.जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च
- D.भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु
व्याख्या
सही उत्तर सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज, बेंगलुरु है, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। विज्ञप्ति इसी संस्थान को बताती है जिसके शोधकर्ताओं ने पेप्टाइड पर ध्यान केंद्रित किया, और वहां डॉ. गौतम घोष ने अपनी पीएचडी स्कॉलर अपर्णा रमेश के साथ इस काम का नेतृत्व किया। विकल्प ख और ग सहयोगी संस्थान हैं और इसीलिए सबसे तेज भ्रम पैदा करते हैं। आईआईएसईआर कोलकाता तथा जेएनसीएएसआर बेंगलुरु दोनों ने योगदान दिया और दोनों के शोधकर्ताओं का नाम है, पर नेतृत्व किसी ने नहीं किया। विकल्प घ का विज्ञप्ति में कोई उल्लेख नहीं है। छात्रों को संस्थान के साथ उसका मूल विभाग भी याद रखना चाहिए, क्योंकि समाचार में आए किसी शोध संस्थान का विभाग पूछा जाता है। यह भी ध्यान रखें कि खोज एंजवेन्टे केमी इंटरनेशनल एडिशन में प्रकाशित हुई।
शोध के अनुसार पीजोइलेक्ट्रिसिटी के लिए मूलभूत संरचनात्मक शर्त कौन सी है?
- A.केंद्रसममितीय क्रिस्टल संरचना
- B.बिना किसी क्रम वाली अक्रिस्टलीय संरचना
- C.गैर-केंद्रसममितीय संरचना
- D.अंतःकेंद्रित घनीय संरचना
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. गैर-केंद्रसममितीय संरचना
व्याख्या
सही उत्तर गैर-केंद्रसममितीय संरचना है। विज्ञप्ति बताती है कि नियंत्रित काइरल स्व-संयोजन आणविक द्विध्रुवों को ऐसी ही संरचना में संरेखित करता है और इसे पीजोइलेक्ट्रिसिटी की मूलभूत संरचनात्मक आवश्यकता कहती है। विकल्प क ठीक उलटी बात कहता है और जल्दबाजी में पढ़ने वाला छात्र इसे चुन लेता है, क्योंकि दोनों शब्दों में केवल एक उपसर्ग का अंतर है। केंद्रसममितीय व्यवस्था में द्विध्रुव आपस में कट जाते हैं और कोई पीजोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया नहीं मिलती। विकल्प ख गलत है, क्योंकि सामग्री का प्रदर्शन अत्यधिक व्यवस्थित सुपरमॉलिक्यूलर संरचना से आया, अव्यवस्था से नहीं। विकल्प घ सामान्य रसायन विज्ञान की एक क्रिस्टल जालक संरचना है, जिसका यहां उल्लेख नहीं है। इस शब्द के साथ व्यावहारिक परिणाम भी जोड़ें, क्योंकि तैयार पेप्टाइड नैनोमटीरियल ने लगभग 30 पीएम प्रति वोल्ट का गुणांक दिखाया।
जीएसएलवी-एफ17 के सफल प्रक्षेपण पर इसरो को किसने बधाई दी?
- A.राष्ट्रपति
- B.उपराष्ट्रपति
- C.प्रधानमंत्री
- D.शिक्षा मंत्री
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. प्रधानमंत्री
व्याख्या
सही उत्तर प्रधानमंत्री है। यह विज्ञप्ति प्रधानमंत्री कार्यालय ने जारी की थी और इसमें बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस प्रक्षेपण को इसरो की एक और शानदार उपलब्धि तथा देश के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने अपनी बात एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से रखी। उनके अनुसार यह सफल प्रक्षेपण भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की उत्कृष्टता, नवाचार और बढ़ती क्षमताओं को दर्शाता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इसरो और भारतीय उद्योग के बीच गहरी होती साझेदारी अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ताकत और विस्तार दे रही है तथा पूरे अंतरिक्ष इकोसिस्टम में देश की क्षमताएं बढ़ा रही है। विकल्प क में दिए राष्ट्रपति और विकल्प ख में दिए उपराष्ट्रपति वे दो पद हैं जिन्हें छात्र अक्सर प्रधानमंत्री की जगह चुन लेते हैं, पर ये कथन उनके नहीं हैं। विकल्प घ में दिए शिक्षा मंत्री का इस प्रक्षेपण से कोई संबंध नहीं है।
ईओएस-05 किस कक्षा से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग उपग्रह है?
- A.निम्न भू कक्षा
- B.सूर्य तुल्यकालिक कक्षा
- C.जियोसिंक्रोनस कक्षा
- D.ध्रुवीय कक्षा
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सही उत्तर: C. जियोसिंक्रोनस कक्षा
व्याख्या
सही उत्तर जियोसिंक्रोनस कक्षा है। इस विज्ञप्ति में ईओएस-05 की सबसे बड़ी विशेषता यही बताई गई है कि यह जियोसिंक्रोनस कक्षा से काम करने वाला भारत का पहला इमेजिंग उपग्रह है। यही एक तथ्य इस प्रक्षेपण को परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है और प्रधानमंत्री ने भी अपने संदेश में यही शब्द इस्तेमाल किए। इस कक्षा में रखा गया उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन के साथ चलता है, इसलिए वह लगभग एक ही क्षेत्र के ऊपर बना रहता है। विकल्प क में दी निम्न भू कक्षा में बहुत से उपग्रह काम करते हैं, लेकिन विज्ञप्ति में ईओएस-05 को वहां नहीं बताया गया है। विकल्प ख में दी सूर्य तुल्यकालिक कक्षा और विकल्प घ में दी ध्रुवीय कक्षा पहले के दूर संवेदन उपग्रहों से जुड़ी हैं, इसीलिए ये आकर्षक भ्रामक विकल्प बनते हैं। इनमें से कोई भी इस विज्ञप्ति में नहीं है। उपलब्धि के शब्द ठीक से याद रखें।
ईओएस-05 उपग्रह को किस प्रक्षेपण यान से अंतरिक्ष में भेजा गया?
- A.पीएसएलवी-सी58
- B.जीएसएलवी-एफ17
- C.एलवीएम3-एम4
- D.एसएसएलवी-डी3
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सही उत्तर: B. जीएसएलवी-एफ17
व्याख्या
सही उत्तर जीएसएलवी-एफ17 है। विज्ञप्ति के अनुसार इसरो ने ईओएस-05 उपग्रह ले जा रहे जीएसएलवी-एफ17 का सफल प्रक्षेपण किया और प्रधानमंत्री ने इस उपलब्धि पर अंतरिक्ष एजेंसी की सराहना की। जीएसएलवी का पूरा नाम जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल है और एफ17 इसी रॉकेट परिवार की इस विशेष उड़ान को दर्शाता है। विकल्प क में दिया पीएसएलवी यानी पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एक अलग रॉकेट परिवार है और इस विज्ञप्ति में उसका कोई उल्लेख नहीं है। विकल्प ग में दिया एलवीएम3 भारी उपग्रहों के लिए प्रयुक्त यान है, जिसका इस प्रक्षेपण से कोई संबंध नहीं है। विकल्प घ में दिया एसएसएलवी छोटे उपग्रहों के लिए बना यान है और वह भी यहां नहीं आता। छात्र अक्सर रॉकेट और उपग्रह के नाम आपस में मिला देते हैं, इसलिए जीएसएलवी-एफ17 और ईओएस-05 को हमेशा एक जोड़ी के रूप में याद रखना चाहिए। प्रधानमंत्री ने इस उड़ान को देश के लिए गर्व का क्षण बताया था।