भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने “संविधान के आधारभूत ढाँचे” के सिद्धान्त को स्पष्ट किया
- A.गोलकनाथ वाद 1967 में
- B.केशवानन्द भारती वाद 1973 में
- C.शंकरी प्रसाद वाद 1951 में
- D.सज्जन सिंह वाद 1965 में
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. केशवानन्द भारती वाद 1973 में
व्याख्या
सही उत्तर है B, केशवानन्द भारती वाद 1973 में। 24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट की अब तक की सबसे बड़ी, 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 के बहुमत से कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, पर उसके आधारभूत ढाँचे को न बदल सकती है, न नष्ट कर सकती है। अदालत ने कोई बंद सूची नहीं दी; बाद के फ़ैसलों में संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, पंथनिरपेक्षता, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण और न्यायिक समीक्षा को इसका हिस्सा माना गया। यह मुक़दमा केरल के एक मठ के प्रमुख ने भूमि सुधार क़ानूनों के विरुद्ध दायर किया था। विकल्प A गलत है, क्योंकि गोलकनाथ वाद (1967) में कहा गया था कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर ही नहीं सकती; केशवानन्द ने इसे पलट दिया। विकल्प C गलत है, क्योंकि शंकरी प्रसाद वाद (1951) ने पहले संशोधन को सही ठहराते हुए मौलिक अधिकारों में संशोधन को संभव माना। विकल्प D गलत है, क्योंकि सज्जन सिंह वाद (1965) ने 17वें संशोधन को सही ठहराते हुए यही बात दोहराई। परीक्षा टिप: शंकरी प्रसाद 1951, सज्जन सिंह 1965, गोलकनाथ 1967, केशवानन्द 1973, मिनर्वा मिल्स 1980।