प्रवर्तन निदेशालय के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा सही नहीं है?
- A.यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन एक विशेष वित्तीय जाँच एजेंसी है।
- B.यह विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 को लागू करता है।
- C.यह धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 को लागू करता है।
- D.यह बेनामी संपत्ति लेन-देन प्रतिषेध अधिनियम, 1988 को लागू करता है।
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है D, यह बेनामी संपत्ति लेन-देन प्रतिषेध अधिनियम, 1988 को लागू करता है। यह कथन गलत है: बेनामी कानून आयकर विभाग लागू करता है, ईडी नहीं।
प्रवर्तन निदेशालय 1956 में बना और यह वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन एक विशेष वित्तीय जाँच एजेंसी है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। यह विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (विदेशी मुद्रा उल्लंघन के दीवानी मामले), धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (आपराधिक मामले, जिनमें यह संपत्ति कुर्क और गिरफ़्तारी कर सकता है) और भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 लागू करता है। बेनामी मामले केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अधीन आयकर विभाग के अधिकारी देखते हैं।
A चुनना गलत है क्योंकि ईडी वास्तव में राजस्व विभाग के अधीन है। B चुनना गलत है क्योंकि फ़ेमा लागू करना इसका मुख्य कार्य है। C चुनना गलत है क्योंकि पीएमएलए वह प्रमुख कानून है जिसे यह लागू करता है।
परीक्षा टिप: ईडी = फ़ेमा, पीएमएलए, भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम; बेनामी अधिनियम = आयकर विभाग (सीबीडीटी)।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंनिम्नलिखित में से कौन-सा भारत का संवैधानिक आयोग नहीं है?
- A.राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
- B.राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
- C.राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
- D.राष्ट्रीय महिला आयोग
उत्तर देखें
इसकी स्थापना राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के तहत 1992 में हुई, इसलिए यह संवैधानिक नहीं, बल्कि सांविधिक निकाय है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →आच्छादन के सिद्धांत के विषय में कौन सा कथन सही है?
- A.यह मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाले संविधान पूर्व और संविधान पश्चात दोनों कानूनों पर समान रूप से लागू होता है
- B.यह संविधान पूर्व के कानूनों पर लागू होता है, जो निष्क्रिय पड़े रहते हैं और संवैधानिक रोक हटने पर पुनर्जीवित हो सकते हैं
- C.यह न्यायालय को अधिनियम के केवल दोषपूर्ण भाग को शून्य करने देता है
- D.यह नागरिक को स्वेच्छा से मूल अधिकार छोड़ने की अनुमति देता है
उत्तर देखें
अनुच्छेद 13(1) संविधान पूर्व के कानून को मूल अधिकारों से असंगति की मात्रा तक ही शून्य करता है, इसलिए उच्चतम न्यायालय ने भीखाजी नारायण धाकरस, 1955 में कहा कि ऐसा कानून मिटता नहीं, केवल आच्छादित होता है और छाया हटने तक अप्रवर्तनीय रहकर उसके बाद पुनर्जीवित हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में भावी अभिखंडन के सिद्धांत का पहली बार प्रयोग किस वाद में हुआ?
- A.आई. सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967
- B.मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978
- C.इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992
- D.एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994
उत्तर देखें
ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के विरुद्ध पांच के बहुमत से कहा कि संसद संशोधन द्वारा मूल अधिकारों को कम नहीं कर सकती, परंतु न्यायालय पहले से क्रियान्वित भूमि सुधार संशोधनों को अस्थिर नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने घोषित किया कि उसका निर्णय केवल आगे के लिए प्रभावी…
पूरी व्याख्या पढ़ें →मूल ढांचा सिद्धांत उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में प्रतिपादित किया?
- A.शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, 1951
- B.सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, 1965
- C.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973
- D.मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980
उत्तर देखें
तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने सात के विरुद्ध छह के बहुमत से कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसके मूल ढांचे या आधारभूत लक्षणों को नष्ट नहीं कर सकती।
पूरी व्याख्या पढ़ें →समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद के कानून और राज्य विधानमंडल के कानून के बीच प्रतिकूलता का निपटारा संविधान का कौन सा अनुच्छेद करता है?
- A.अनुच्छेद 246
- B.अनुच्छेद 249
- C.अनुच्छेद 254
- D.अनुच्छेद 256
उत्तर देखें
खंड (1) कहता है कि यदि समवर्ती विषय पर राज्य का कानून संसद के कानून के प्रतिकूल है, तो संसद का कानून प्रभावी होगा और राज्य का कानून प्रतिकूलता की मात्रा तक शून्य होगा।
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