निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का संवैधानिक आयोग नहीं है?
- A.राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
- B.राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
- C.राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
- D.राष्ट्रीय महिला आयोग
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है D, राष्ट्रीय महिला आयोग। इसकी स्थापना राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के तहत 1992 में हुई, इसलिए यह संवैधानिक नहीं, बल्कि सांविधिक निकाय है।
बाकी तीन आयोगों को दर्जा सीधे संविधान से मिला है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का प्रावधान अनुच्छेद 338 में है और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का अनुच्छेद 338A में, जो 2003 के 89वें संशोधन से जुड़ा। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग 2018 के 102वें संशोधन से अनुच्छेद 338B के तहत संवैधानिक बना; पहले यह 1993 के अधिनियम से बना सांविधिक निकाय था।
A गलत है, क्योंकि अनुसूचित जाति आयोग अनुच्छेद 338 के तहत संवैधानिक है। B गलत है, क्योंकि अनुसूचित जनजाति आयोग अनुच्छेद 338A के तहत संवैधानिक है। C गलत है, क्योंकि पिछड़ा वर्ग आयोग 2018 से अनुच्छेद 338B के तहत संवैधानिक है।
परीक्षा टिप: अनुच्छेद 338, 338A और 338B क्रमशः अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग आयोग; महिला आयोग 1990 के अधिनियम से बना सांविधिक निकाय।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंनिम्नलिखित में से किस राज्य में सबसे अधिक बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है?
- A.बिहार
- B.कर्नाटक
- C.मणिपुर
- D.पंजाब
उत्तर देखें
मणिपुर में किसी भी अन्य राज्य से अधिक बार राष्ट्रपति शासन लगा है, 1967 से अब तक दस से अधिक बार।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत का संविधान वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, किंतु यह स्वतंत्रता राज्य द्वारा लगाए गए कुछ युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है। ये निर्बंधन निम्नलिखित में से किससे संबंधित हो सकते हैं?
1. मानहानि
2. शिष्टाचार या सदाचार
3. अपराध के लिए उकसाना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- A.केवल 1
- B.केवल 2 और 3
- C.केवल 1 और 3
- D.1, 2 और 3
उत्तर देखें
ये तीनों अनुच्छेद 19(2) में दिए गए वे आधार हैं जिन पर राज्य वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →आच्छादन के सिद्धांत के विषय में कौन सा कथन सही है?
- A.यह मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाले संविधान पूर्व और संविधान पश्चात दोनों कानूनों पर समान रूप से लागू होता है
- B.यह संविधान पूर्व के कानूनों पर लागू होता है, जो निष्क्रिय पड़े रहते हैं और संवैधानिक रोक हटने पर पुनर्जीवित हो सकते हैं
- C.यह न्यायालय को अधिनियम के केवल दोषपूर्ण भाग को शून्य करने देता है
- D.यह नागरिक को स्वेच्छा से मूल अधिकार छोड़ने की अनुमति देता है
उत्तर देखें
अनुच्छेद 13(1) संविधान पूर्व के कानून को मूल अधिकारों से असंगति की मात्रा तक ही शून्य करता है, इसलिए उच्चतम न्यायालय ने भीखाजी नारायण धाकरस, 1955 में कहा कि ऐसा कानून मिटता नहीं, केवल आच्छादित होता है और छाया हटने तक अप्रवर्तनीय रहकर उसके बाद पुनर्जीवित हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में भावी अभिखंडन के सिद्धांत का पहली बार प्रयोग किस वाद में हुआ?
- A.आई. सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, 1967
- B.मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978
- C.इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992
- D.एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994
उत्तर देखें
ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने छह के विरुद्ध पांच के बहुमत से कहा कि संसद संशोधन द्वारा मूल अधिकारों को कम नहीं कर सकती, परंतु न्यायालय पहले से क्रियान्वित भूमि सुधार संशोधनों को अस्थिर नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने घोषित किया कि उसका निर्णय केवल आगे के लिए प्रभावी…
पूरी व्याख्या पढ़ें →मूल ढांचा सिद्धांत उच्चतम न्यायालय ने किस वाद में प्रतिपादित किया?
- A.शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, 1951
- B.सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, 1965
- C.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973
- D.मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, 1980
उत्तर देखें
तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने सात के विरुद्ध छह के बहुमत से कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसके मूल ढांचे या आधारभूत लक्षणों को नष्ट नहीं कर सकती।
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