संविधान की प्रस्तावना की विधिक प्रकृति क्या है?
- A.यह प्रवर्तनीय है
- B.यह प्रवर्तनीय नहीं है
- C.विशेष परिस्थितियों में इसे प्रवर्तित किया जा सकता है
- D.इनमें से कोई नहीं
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. यह प्रवर्तनीय नहीं है
व्याख्या
सही उत्तर है B, यह प्रवर्तनीय नहीं है। प्रस्तावना संविधान के उद्देश्य और सत्ता के स्रोत को बताती है, पर यह न कोई अधिकार देती है और न कोई ऐसा कर्तव्य थोपती है जिसे अदालत लागू करा सके, इसलिए कोई केवल प्रस्तावना के आधार पर न्यायालय नहीं जा सकता। 1960 के बेरुबाड़ी यूनियन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान निर्माताओं के मन की कुंजी कहा था और माना था कि यह संविधान का भाग नहीं है; 1973 के केशवानंद भारती मामले में न्यायालय ने यह मत बदलकर कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग है और मूल ढाँचे को छुए बिना इसमें संशोधन हो सकता है, फिर भी यह वाद-योग्य नहीं है। विकल्प A गलत है, क्योंकि केवल प्रस्तावना के आधार पर राहत नहीं मिलती। विकल्प C गलत है, क्योंकि ऐसी कोई विशेष स्थिति नहीं है। विकल्प D गलत है, क्योंकि विकल्प B सही है। परीक्षा टिप: प्रस्तावना संविधान का भाग, पर वाद-योग्य नहीं; एक बार संशोधित, 42वें संशोधन 1976 से।