नालंदा विश्वविद्यालय और सीएसआईआर-टीकेडीएल में समझौता
नालंदा विश्वविद्यालय और सीएसआईआर-टीकेडीएल इकाई ने 1 अक्टूबर 2026 को पारंपरिक ज्ञान पर शोध और प्रशिक्षण के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।

चर्चा में क्यों
1 अक्टूबर 2026 को नालंदा विश्वविद्यालय और सीएसआईआर-पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय इकाई ने पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकार और सांस्कृतिक विरासत पर शैक्षणिक, शोध तथा क्षमता निर्माण सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसमें बिहार की पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भी शामिल हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय और सीएसआईआर-पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (टीकेडीएल) इकाई ने पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकार, समुदायों के अधिकार और सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में मिलकर काम करने का निर्णय लिया है। दोनों के बीच समझौता ज्ञापन पर 1 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षर हुए।
हस्ताक्षर किसने किए
विश्वविद्यालय की ओर से कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने और इकाई की ओर से वैज्ञानिक-एच तथा प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे सत्तिगेरी ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक और इकाई के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
साझेदारी में क्या होगा
दोनों पक्ष अपनी अलग-अलग क्षमताओं को जोड़कर शैक्षणिक और शोध कार्य करेंगे। इसमें बौद्धिक आदान-प्रदान, प्रशिक्षण, विद्यार्थियों की इंटर्नशिप, आपसी यात्राएँ और नेटवर्किंग शामिल हैं। बिहार की पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि भारत के पारंपरिक ज्ञान के दुरुपयोग को रोकने में यह डिजिटल पुस्तकालय बड़ी भूमिका निभाता है। उन्होंने समुदायों के पारिस्थितिक ज्ञान, लोककथाओं और संगीत को विषय के अनुसार क्रमबद्ध रूप से दर्ज करने तथा नई पीढ़ी को बौद्धिक संपदा के विषय में प्रशिक्षित करने पर बल दिया। उनका कहना था कि यह ज्ञान इस तरह उपलब्ध कराया जाए जिससे ज्ञान रखने वाले समुदायों के हित सुरक्षित रहें। डॉ. सत्तिगेरी ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान के मामले में भारत विश्व में अग्रणी रहा है और नया नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा तथा शोध के केंद्र के रूप में अपनी पुरानी प्रतिष्ठा फिर पा सकता है।
डिजिटल पुस्तकालय के बारे में
भारत सरकार ने सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय के सहयोग से 2001 में पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय की स्थापना की थी। यह अपनी तरह का विश्व का पहला डेटाबेस था। इसका उद्देश्य भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर गलत ढंग से पेटेंट दिए जाने को रोकना और देश की विरासत के दुरुपयोग पर अंकुश लगाना है।
| स्थापना | 2001, सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय द्वारा |
| संग्रह | 5.2 लाख से अधिक सूत्र और पद्धतियाँ |
| चिकित्सा पद्धतियाँ | आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा और योग |
| भाषाएँ | अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, जापानी और स्पेनिश |
| पहुँच | 18 अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालय |
इसकी सामग्री पारंपरिक ग्रंथों से ली जाती है और आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली से जोड़कर लिखी जाती है, जिससे पेटेंट परीक्षक उसे पढ़ सके। पाँच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में उपलब्ध होने के कारण भाषा और लिपि की अड़चन समाप्त हो जाती है। गोपनीयता समझौतों के अंतर्गत 18 अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों को इसकी पहुँच दी गई है। इससे मिले पूर्व-ज्ञान के साक्ष्य के आधार पर दुनिया भर में 375 से अधिक पेटेंट आवेदन रद्द, अस्वीकृत, संशोधित या वापस लिए जा चुके हैं।
विश्वविद्यालय के बारे में
नालंदा विश्वविद्यालय बिहार के नालंदा जिले में राजगीर में स्थित है और विदेश मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय महत्व के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया गया है। प्राचीन नालंदा की विरासत के आधार पर यह बौद्धिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अध्ययन को आगे बढ़ाता है और एक-दूसरे के इतिहास की समझ बढ़ाने का प्रयास करता है।
किन नीतियों से जुड़ाव
दोनों पक्षों को भरोसा है कि यह सहयोग पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा और सांस्कृतिक विरासत के विषय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय आईपीआर नीति 2016 के उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक होगा और भारतीय ज्ञान परंपरा में साक्ष्य आधारित शोध को बल देगा।
महत्वपूर्ण तथ्य
| समझौता | नालंदा विश्वविद्यालय और सीएसआईआर-टीकेडीएल इकाई के बीच समझौता ज्ञापन |
|---|---|
| हस्ताक्षर की तिथि | 1 अक्टूबर 2026 |
| हस्ताक्षरकर्ता | प्रो. सचिन चतुर्वेदी (कुलपति, नालंदा विश्वविद्यालय) और डॉ. विश्वजननी जे सत्तिगेरी (प्रमुख, सीएसआईआर-टीकेडीएल इकाई) |
| विषय क्षेत्र | पारंपरिक ज्ञान, बौद्धिक संपदा अधिकार, जन अधिकार, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ |
| टीकेडीएल की स्थापना | 2001, सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय के सहयोग से |
| टीकेडीएल संग्रह | आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा और योग के 5.2 लाख से अधिक सूत्र और पद्धतियाँ |
| भाषाएँ | अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, जापानी और स्पेनिश |
| पेटेंट कार्यालयों की पहुँच | 18, गोपनीयता समझौतों के अंतर्गत |
| प्रभावित पेटेंट आवेदन | 375 से अधिक रद्द, अस्वीकृत, संशोधित या वापस |
| नालंदा विश्वविद्यालय का स्थान | राजगीर, नालंदा जिला, बिहार; विदेश मंत्रालय के अधीन |
| संबंधित नीतियाँ | राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय आईपीआर नीति 2016 |
परीक्षा की दृष्टि से
याद रखें कि टीकेडीएल की शुरुआत 2001 में सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय ने की और यह विश्व का पहला ऐसा डेटाबेस था; इसमें 5.2 लाख से अधिक सूत्र हैं, यह पाँच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में है और 18 पेटेंट कार्यालयों को उपलब्ध है; इसके कारण 375 से अधिक पेटेंट आवेदन रुके। नालंदा विश्वविद्यालय बिहार के राजगीर में विदेश मंत्रालय के अधीन है, कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी हैं, और नीतियाँ हैं एनईपी 2020 तथा राष्ट्रीय आईपीआर नीति 2016।
अभ्यास प्रश्न
भारत के पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (टीकेडीएल) की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
- A.1995
- B.2001
- C.2008
- D.2014
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 2001
व्याख्या
सही उत्तर 2001 है। भारत सरकार ने इसी वर्ष सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय को साथ लेकर पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय की स्थापना की, और यह अपनी तरह का विश्व का पहला डेटाबेस था। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर गलत ढंग से पेटेंट न दिए जाएँ और देश की विरासत के दुरुपयोग पर रोक लगे। इस पुस्तकालय में आज आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और सोवा रिग्पा जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों तथा योग के 5.2 लाख से अधिक सूत्र और पद्धतियाँ दर्ज हैं, जिन्हें पारंपरिक ग्रंथों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली से जोड़ा गया है, ताकि पेटेंट परीक्षक उन्हें समझ सके। विकल्प A, C और D गलत हैं क्योंकि इनमें से कोई भी स्थापना वर्ष नहीं है; पहला विकल्प बहुत पहले का है जब यह पुस्तकालय अस्तित्व में ही नहीं था, और शेष दोनों उस समय के हैं जब यह पहले से काम कर रहा था। परीक्षा सूत्र: टीकेडीएल यानी 2001, सीएसआईआर और आयुष, तथा विश्व में पहला।
सीएसआईआर-टीकेडीएल इकाई से समझौता करने वाला नालंदा विश्वविद्यालय कहाँ स्थित है?
- A.बोधगया, बिहार
- B.वैशाली, बिहार
- C.राजगीर, बिहार
- D.पटना, बिहार
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. राजगीर, बिहार
व्याख्या
सही उत्तर राजगीर, बिहार है। नालंदा विश्वविद्यालय बिहार के नालंदा जिले में राजगीर में राष्ट्रीय महत्व के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया गया है और यह विदेश मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इसके उद्देश्य प्राचीन नालंदा की विरासत और मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर आधारित हैं, और यहाँ बौद्धिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक अध्ययन को आगे बढ़ाया जाता है। इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवन का लक्ष्य क्षेत्रीय समझ बढ़ाना और एक-दूसरे की विरासत तथा इतिहास की सराहना करना है, जिससे विद्यार्थी, विद्वान और शोधकर्ता साथ मिलकर काम कर सकें। विकल्प A, B और D गलत हैं क्योंकि ये बिहार के प्रसिद्ध स्थान होते हुए भी इस विश्वविद्यालय के स्थान नहीं हैं; इसका परिसर राजगीर में है, जो प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेषों के सबसे निकट का नगर है। परीक्षा सूत्र: नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर, नालंदा जिला, विदेश मंत्रालय।
गोपनीयता समझौतों के अंतर्गत टीकेडीएल डेटाबेस कितने अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों को उपलब्ध कराया गया है?
- A.9
- B.12
- C.18
- D.26
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 18
व्याख्या
सही उत्तर 18 है। पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय इस समय इतने ही अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों के लिए खुला है, और प्रत्येक को यह पहुँच गोपनीयता समझौते के माध्यम से मिलती है, जिससे यह ज्ञान पेटेंट दावों की जाँच में काम आता है पर सार्वजनिक नहीं होता। यह डेटाबेस पाँच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं यानी अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, जापानी और स्पेनिश में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे भाषा और लिपि की वह अड़चन दूर हो जाती है जो विदेश के परीक्षक को भारतीय ग्रंथ पढ़ने से रोकती है। इसका परिणाम भी दिखा है: इस पुस्तकालय से मिले पूर्व-ज्ञान के साक्ष्य के कारण दुनिया भर में 375 से अधिक पेटेंट आवेदन रद्द, अस्वीकृत, संशोधित या वापस लिए गए हैं। विकल्प A, B और D गलत हैं क्योंकि इनमें दी गई संख्या वर्तमान पहुँच से कम या अधिक है। परीक्षा सूत्र: 18 पेटेंट कार्यालय, पाँच भाषाएँ और 375 से अधिक आवेदन।
टीकेडीएल की स्थापना सीएसआईआर ने किस केंद्रीय मंत्रालय के सहयोग से की थी?
- A.संस्कृति मंत्रालय
- B.आयुष मंत्रालय
- C.शिक्षा मंत्रालय
- D.विदेश मंत्रालय
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. आयुष मंत्रालय
व्याख्या
सही उत्तर आयुष मंत्रालय है। भारत सरकार ने सीएसआईआर और इसी मंत्रालय के सहयोग से पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय बनाया था, और यह स्वाभाविक साझेदार है क्योंकि इस डेटाबेस में भारतीय चिकित्सा पद्धतियों, अर्थात आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और सोवा रिग्पा तथा योग के सूत्र और पद्धतियाँ दर्ज हैं। पुस्तकालय में ऐसे 5.2 लाख से अधिक सूत्र हैं, जिन्हें पारंपरिक ग्रंथों से लिया गया और आधुनिक शब्दावली से जोड़ा गया है। विकल्प A और C गलत हैं क्योंकि विषय का संबंध विरासत और शिक्षा से होते हुए भी संस्कृति मंत्रालय या शिक्षा मंत्रालय इस डेटाबेस के निर्माण में पक्षकार नहीं थे। विकल्प D इस दृष्टि से ध्यान देने योग्य है कि विदेश मंत्रालय के अधीन नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित है, वह टीकेडीएल का साझेदार नहीं है। परीक्षा सूत्र: टीकेडीएल यानी सीएसआईआर और आयुष; नालंदा विश्वविद्यालय यानी विदेश मंत्रालय।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय क्या है?
यह भारत सरकार द्वारा सीएसआईआर और आयुष मंत्रालय के सहयोग से 2001 में बनाया गया डेटाबेस है, जो अपनी तरह का विश्व में पहला था। यह भारतीय पारंपरिक ज्ञान को दर्ज रखता है जिससे उस पर गलत पेटेंट न दिए जा सकें, और इसमें 5.2 लाख से अधिक सूत्र तथा पद्धतियाँ हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय के साथ समझौते पर किसने हस्ताक्षर किए?
इकाई की ओर से वैज्ञानिक-एच तथा प्रमुख डॉ. विश्वजननी जे सत्तिगेरी ने और विश्वविद्यालय की ओर से कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने 1 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षर किए।
टीकेडीएल कितने पेटेंट कार्यालयों को उपलब्ध है?
गोपनीयता समझौतों के अंतर्गत 18 अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों को इसकी पहुँच है। इसके साक्ष्य के आधार पर दुनिया भर में 375 से अधिक पेटेंट आवेदन रद्द, अस्वीकृत, संशोधित या वापस लिए गए हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय कहाँ स्थित है?
बिहार के नालंदा जिले के राजगीर में। यह विदेश मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय महत्व के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित है और प्राचीन नालंदा की विरासत पर आधारित है।
स्रोत
- https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2317976 (नए टैब में खुलेगा) — Press Information Bureau
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