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GK24

अश्वगंधा मूल अर्क 24 सप्ताह तक सुरक्षित, 1,200 वयस्कों पर अध्ययन

बहु-केंद्रित अध्ययन में 1,200 टीकाकृत वयस्कों पर 24 सप्ताह तक मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क सुरक्षित पाया गया, लिवर या किडनी को नुकसान नहीं हुआ।

लेखक प्रकाशित · 2 मिनट
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अश्वगंधा मूल अर्क 24 सप्ताह तक सुरक्षित, 1,200 वयस्कों पर अध्ययन — GK24 title card

चर्चा में क्यों

आयुष मंत्रालय ने फ्रंटियर्स इन मेडिसिन में प्रकाशित उस बहु-केंद्रित क्लिनिकल अध्ययन को रेखांकित किया, जिसमें 1,200 टीकाकृत वयस्कों पर 24 सप्ताह तक मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क सुरक्षित और सहनीय पाया गया।

मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क पर हुए एक बड़े क्लिनिकल अध्ययन में पाया गया है कि इसे प्रतिदिन 24 सप्ताह तक लेने पर शरीर ने इसे अच्छी तरह सहन किया और लिवर या किडनी को नुकसान का कोई प्रमाण नहीं मिला। यह शोधपत्र 20 अगस्त 2026 को फ्रंटियर्स इन मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित हुआ और आयुष मंत्रालय ने साक्ष्य आधारित आयुर्वेद के लिए इसके महत्व को रेखांकित किया है।

अध्ययन की रूपरेखा

यह रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड और प्लेसीबो नियंत्रित परीक्षण देश के सात केंद्रों पर चलाया गया। इसमें 18 से 70 वर्ष आयु वर्ग के 1,200 स्वस्थ वयस्क शामिल हुए, जिन सभी को कोविडशील्ड टीके की पहली, दूसरी अथवा बूस्टर खुराक मिल चुकी थी। हर प्रतिभागी को या तो प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय मूल अर्क दिया गया, जो कच्ची जड़ के 4 ग्राम चूर्ण के बराबर है, या फिर वैसा ही दिखने वाला प्लेसीबो।

किसने किया अध्ययन

इस अध्ययन में नौ संस्थानों के 45 शोधकर्ता शामिल रहे, जिन्होंने आयुर्वेद, क्लिनिकल मेडिसिन, रूमेटोलॉजी और एकीकृत स्वास्थ्य के अनुभव को जोड़ा। इनमें केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय जैसे संस्थान शामिल थे। पुणे के सेंटर फॉर र्‍यूमेटिक डिजीजेज के डॉ. अरविंद चोपड़ा प्रमुख लेखक रहे।

क्या नतीजे निकले

प्रतिभागियों ने 24 सप्ताह तक अर्क लिया और 28वें सप्ताह तक उनका फॉलो-अप हुआ। शामिल 1,200 लोगों में से 1,032 यानी 86 प्रतिशत ने अध्ययन पूरा किया। लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया सभी निर्धारित संदर्भ सीमाओं के भीतर रहे। किसी गंभीर प्रतिकूल घटना को अर्क से नहीं जोड़ा गया और न ही कोई प्रतिभागी इस कारण अध्ययन से बाहर हुआ। टीके से बनी प्रतिरक्षा पर भी असर नहीं पड़ा, क्योंकि दोनों समूहों में वायरस निष्क्रिय करने वाली गतिविधि 85 प्रतिशत से ऊपर रही।

अधिकारियों की प्रतिक्रिया

आयुष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि उच्च गुणवत्ता वाला क्लिनिकल अनुसंधान आयुर्वेद के वैज्ञानिक आधार को मजबूत करता है। सह-लेखक और आयुष के राष्ट्रीय प्रोफेसर प्रो. भूषण पाटवर्धन ने इसे पारंपरिक आधार बनाए रखते हुए आधुनिक परीक्षण का उदाहरण बताया। परिषद के महानिदेशक प्रो. रबिनारायण आचार्य ने कहा कि ऐसे सुव्यवस्थित अध्ययन मानकीकृत आयुर्वेदिक तैयारियों के जिम्मेदार उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य

हस्तक्षेपमानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क, प्रतिदिन 500 मिलीग्राम
समकक्ष मात्राकच्ची जड़ का 4 ग्राम चूर्ण
अवधि24 सप्ताह, फॉलो-अप 28वें सप्ताह तक
प्रतिभागी18 से 70 वर्ष के 1,200 स्वस्थ वयस्क, सभी कोविडशील्ड टीकाकृत
पूरा करने वाले1,032 प्रतिभागी, यानी 86 प्रतिशत
अध्ययन केंद्रभारत में सात
शोधकर्तानौ संस्थानों के 45 शोधकर्ता
प्रमुख लेखकडॉ. अरविंद चोपड़ा, सेंटर फॉर र्‍यूमेटिक डिजीजेज, पुणे
पत्रिकाफ्रंटियर्स इन मेडिसिन, प्रकाशन 20 अगस्त 2026
आयुष सचिववैद्य राजेश कोटेचा
सीसीआरएएस महानिदेशकप्रो. रबिनारायण आचार्य

परीक्षा की दृष्टि से

अवधि 24 सप्ताह, 18 से 70 वर्ष के 1,200 प्रतिभागी, प्रतिदिन 500 मिलीग्राम की खुराक जो 4 ग्राम कच्ची जड़ चूर्ण के बराबर है, 1,032 यानी 86 प्रतिशत का अध्ययन पूरा करना, पत्रिका का नाम, प्रमुख लेखक तथा सीसीआरएएस की भूमिका याद रखें।

अभ्यास प्रश्न

Q1.विज्ञान और प्रौद्योगिकीआसान

मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क पर हुए बहु-केंद्रित क्लिनिकल परीक्षण में कितने प्रतिभागी शामिल किए गए?

  1. A.600
  2. B.900
  3. C.1,200
  4. D.1,500
उत्तर देखें

सही उत्तर: C. 1,200

व्याख्या

सही उत्तर 1,200 है। इस रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड और प्लेसीबो नियंत्रित परीक्षण में 18 से 70 वर्ष आयु वर्ग के इतने स्वस्थ वयस्क शामिल किए गए, जिन सभी को कोविडशील्ड टीके की पहली, दूसरी अथवा बूस्टर खुराक पहले ही मिल चुकी थी, और यह अध्ययन देश के सात केंद्रों पर चलाया गया। छह सौ, नौ सौ और पंद्रह सौ वाले विकल्प गलत हैं, क्योंकि इनमें से कोई भी संख्या इस अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों से मेल नहीं खाती। एक अन्य आंकड़े को इससे अलग रखना चाहिए: शामिल लोगों में से 1,032 प्रतिभागियों, यानी 86 प्रतिशत ने पूरा अध्ययन पूरा किया और 28वें सप्ताह तक उनका फॉलो-अप हुआ। यह परीक्षण भारत की क्लिनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री में पंजीकृत था और इसे बहु-केंद्रित, रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड तथा प्लेसीबो नियंत्रित रूप में तैयार किया गया था, जिसे स्वस्थ आबादी में सुरक्षा और सहनशीलता के प्रश्नों पर सबसे भरोसेमंद प्रमाण माना जाता है। अध्ययन में क्लिनिकल, प्रयोगशाला और इम्यूनोलॉजिकल आकलन शामिल थे।

Q2.विज्ञान और प्रौद्योगिकीमध्यम

परीक्षण में प्रतिभागियों को मानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क की कितनी दैनिक खुराक दी गई?

  1. A.250 मिलीग्राम
  2. B.500 मिलीग्राम
  3. C.750 मिलीग्राम
  4. D.1,000 मिलीग्राम
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. 500 मिलीग्राम

व्याख्या

सही उत्तर 500 मिलीग्राम प्रतिदिन है, और इस मात्रा को कच्ची जड़ के चार ग्राम चूर्ण के बराबर बताया गया है। प्रतिभागियों को यादृच्छिक रूप से या तो यह मानकीकृत जलीय अर्क दिया गया या वैसा ही दिखने वाला प्लेसीबो, और यह आवंटन डबल-ब्लाइंड था, यानी न प्रतिभागी और न ही आकलन करने वाले यह जानते थे कि कौन किस समूह में है। ढाई सौ, साढ़े सात सौ और एक हजार मिलीग्राम वाले विकल्प गलत हैं, क्योंकि केवल एक ही खुराक का परीक्षण किया गया; यह अध्ययन सुरक्षा और सहनशीलता पर केंद्रित था, खुराक की तुलना पर नहीं। पूरी अवधि में लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया की निगरानी की गई। अध्ययन में यह भी देखा गया कि क्या यह अर्क टीकाकरण के बाद बनी प्रतिरक्षा में हस्तक्षेप करता है, और दोनों समूहों में वायरस निष्क्रिय करने वाली गतिविधि 85 प्रतिशत से ऊपर मिली तथा उनके बीच कोई सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया।

Q3.विज्ञान और प्रौद्योगिकीमध्यम

अश्वगंधा की सुरक्षा पर हुआ यह अध्ययन किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ?

  1. A.द लांसेट
  2. B.फ्रंटियर्स इन मेडिसिन
  3. C.नेचर मेडिसिन
  4. D.इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च
उत्तर देखें

सही उत्तर: B. फ्रंटियर्स इन मेडिसिन

व्याख्या

सही उत्तर फ्रंटियर्स इन मेडिसिन है, जिसमें यह शोधपत्र 20 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ। इसका शीर्षक कोविडशील्ड टीकाकरण के बाद अश्वगंधा के दीर्घकालिक निवारक उपयोग और सहनशीलता से जुड़ा है। द लांसेट विकल्प गलत है, क्योंकि यह अध्ययन उसमें प्रकाशित नहीं हुआ, हालांकि वह सबसे प्रसिद्ध चिकित्सा पत्रिकाओं में गिनी जाती है और इसीलिए भ्रम पैदा करती है। नेचर मेडिसिन विकल्प भी इसी कारण गलत है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च विकल्प भी सही नहीं है, क्योंकि अध्ययन भारतीय संस्थानों ने भारतीय केंद्रों पर किया, पर प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में हुआ। इसमें नौ संस्थानों के 45 शोधकर्ता शामिल थे। आयुष मंत्रालय ने इस शोधपत्र को मानकीकृत आयुर्वेदिक तैयारियों के लिए कठोर क्लिनिकल प्रमाण तैयार करने के व्यापक प्रयास के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया। यही बात आयुष सचिव, आयुष के राष्ट्रीय प्रोफेसर तथा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक ने अपने-अपने बयानों में दोहराई, जिन्होंने कहा कि ऐसे अध्ययन आयुर्वेद के वैज्ञानिक आधार को मजबूत करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अश्वगंधा पर हुए अध्ययन में क्या निष्कर्ष निकला?

मानकीकृत अश्वगंधा मूल अर्क का 24 सप्ताह तक दैनिक सेवन अच्छी तरह सहन किया गया, लिवर और किडनी के मानक संदर्भ सीमाओं के भीतर रहे और कोई क्षति नहीं पाई गई।

इस परीक्षण में कितने लोग शामिल हुए?

देश के सात केंद्रों पर 18 से 70 वर्ष आयु के 1,200 स्वस्थ वयस्क शामिल हुए, जिनमें से 1,032 यानी 86 प्रतिशत ने अध्ययन पूरा किया।

क्या अश्वगंधा से टीके की प्रतिरक्षा प्रभावित हुई?

नहीं। अश्वगंधा और प्लेसीबो दोनों समूहों में वायरस निष्क्रिय करने वाली गतिविधि 85 प्रतिशत से अधिक रही और दोनों के बीच कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं मिला।

अध्ययन में कौन सी संस्थाएं शामिल थीं?

नौ संस्थानों के 45 शोधकर्ता शामिल थे, जिनमें केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद प्रमुख है। पुणे के डॉ. अरविंद चोपड़ा प्रमुख लेखक रहे।

स्रोत

इनके लिए उपयोगी:SSCSSC CGLIBPS