वर्ष के कुछ ही महीनों में काम उपलब्ध होने से उत्पन्न बेरोजगारी क्या कहलाती है?
- A.मौसमी बेरोजगारी
- B.संरचनात्मक बेरोजगारी
- C.प्रच्छन्न बेरोजगारी
- D.शिक्षित बेरोजगारी
सही उत्तर
A. मौसमी बेरोजगारी
व्याख्या
सही उत्तर A, मौसमी बेरोजगारी है। कृषि में बुवाई, रोपाई और कटाई के समय श्रम की मांग रहती है और बीच में बहुत कम, तथा किसी फसल से जुड़े उद्योग जैसे चीनी मिलें और चावल मिलें वर्ष के एक भाग में ही चलते हैं, इसलिए उनसे जुड़े श्रमिक शेष महीनों में खाली रहते हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि संरचनात्मक बेरोजगारी श्रमिकों के कौशल और अर्थव्यवस्था द्वारा सृजित रोजगार के बेमेल से आती है और वह पूरे वर्ष बनी रहती है, कैलेंडर के अनुसार नहीं चलती। विकल्प C गलत है क्योंकि प्रच्छन्न बेरोजगारी में पूरे मौसम अतिरिक्त श्रमिक काम पर लगे रहते हैं, जिनके हटने पर उत्पादन नहीं घटता। विकल्प D गलत है क्योंकि शिक्षित बेरोजगारी उन प्रशिक्षित युवाओं की है जिन्हें योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिलता, जो वर्ष के समय का नहीं रोजगार की गुणवत्ता का प्रश्न है।
पूरा लेख पढ़ें: भारत में गरीबी और बेरोजगारी: अवधारणा, मापन और प्रश्न
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंभारत में गरीबी रेखा की गणना के लिए प्रतिदर्श सर्वेक्षण निम्नलिखित में से कौन-सा संगठन कराता है?
- A.वित्त मंत्रालय
- B.भारतीय रिजर्व बैंक
- C.केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय
- D.राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय
व्याख्या
सही उत्तर D, राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय है। यही संस्था उपभोग व्यय के बड़े घरेलू सर्वेक्षण कराती है, जिनसे गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या निकाली जाती है, और अब यह सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के भीतर काम करती है। विकल्प A गलत है क्योंकि वित्त मंत्रालय बजट और आर्थिक समीक्षा में इन अनुमानों का उपयोग तो करता है पर घरेलू आंकड़े स्वयं एकत्र नहीं करता। विकल्प B गलत है क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक प्राधिकरण और बैंकिंग नियामक है, और उसके आंकड़े मुद्रा, ऋण तथा भुगतान से जुड़े होते हैं, घरेलू उपभोग टोकरी से नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय राष्ट्रीय लेखा और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक बनाता था; घरेलू प्रतिदर्श सर्वेक्षण दूसरी संस्था का काम था और 2019 में दोनों का विलय राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय में हुआ।
जो लोग नियमित रूप से गरीबी रेखा के आर-पार आते-जाते रहते हैं, उन्हें क्या कहा जाता है?
- A.कभी-कभार के गरीब
- B.प्रायः गरीब
- C.दीर्घकालिक गरीब
- D.मंथन वाले गरीब
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. मंथन वाले गरीब
व्याख्या
सही उत्तर D, मंथन वाले गरीब है। मानक वर्गीकरण में मंथन वाले गरीब वे हैं जिनका उपभोग बार-बार गरीबी रेखा से ऊपर जाकर फिर नीचे आ जाता है; इसके ठेठ उदाहरण छोटे तथा सीमांत किसान और वे दिहाड़ी मजदूर हैं जिनकी कमाई मौसम पर निर्भर करती है। विकल्प A गलत है क्योंकि कभी-कभार के गरीब सामान्यतः रेखा से ऊपर रहते हैं और किसी बीमारी या फसल हानि जैसी विपत्ति में ही नीचे जाते हैं, इसलिए उनकी आवाजाही नियमित नहीं होती। विकल्प B गलत है क्योंकि प्रायः गरीब अधिकांश समय रेखा से नीचे रहते हैं और वे दीर्घकालिक गरीबों का ही भाग हैं, आर-पार आने-जाने वाला वर्ग नहीं। विकल्प C गलत है क्योंकि सदा गरीब और प्रायः गरीब मिलकर बने दीर्घकालिक गरीब वर्ष दर वर्ष रेखा से नीचे बने रहते हैं, यानी वही वर्ग है जो रेखा पार नहीं करता।
वह स्थिति जिसमें किसी काम में आवश्यकता से अधिक श्रमिक लगे हों और कुछ के हटने पर भी उत्पादन न घटे, क्या कहलाती है?
- A.घर्षणात्मक बेरोजगारी
- B.प्रच्छन्न बेरोजगारी
- C.चक्रीय बेरोजगारी
- D.संरचनात्मक बेरोजगारी
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. प्रच्छन्न बेरोजगारी
व्याख्या
सही उत्तर B, प्रच्छन्न बेरोजगारी है। इसमें अतिरिक्त श्रमिक देखने में कार्यरत लगते हैं, पर उत्पादन में उनका सीमांत योगदान लगभग शून्य होता है, इसीलिए इसे छिपी हुई बेरोजगारी कहा जाता है; भारत का मानक उदाहरण वह पारिवारिक खेत है जिस पर कई सदस्य उतनी भूमि जोतते हैं जिसे दो लोग संभाल सकते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि घर्षणात्मक बेरोजगारी एक नौकरी छोड़कर दूसरी खोजने के बीच का छोटा अंतराल है और वह पूरी तरह स्वस्थ अर्थव्यवस्था में भी रहती है। विकल्प C गलत है क्योंकि चक्रीय बेरोजगारी मंदी में मांग घटने से आती है और अर्थव्यवस्था के सुधरते ही समाप्त हो जाती है। विकल्प D गलत है क्योंकि संरचनात्मक बेरोजगारी तब होती है जब श्रमिकों का कौशल अर्थव्यवस्था द्वारा सृजित रोजगार से मेल नहीं खाता, जिसके लिए मांग नहीं बल्कि पुनःप्रशिक्षण चाहिए।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत एक ग्रामीण परिवार को वित्तीय वर्ष में कितने दिन के रोजगार की गारंटी है?
- A.50
- B.75
- C.100
- D.150
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. 100
व्याख्या
सही उत्तर C, सौ दिन है। 2005 में पारित इस अधिनियम से हर उस ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने को तैयार हों, एक वित्तीय वर्ष में सौ दिन के मजदूरी रोजगार का कानूनी अधिकार मिलता है, और निर्धारित अवधि में काम न मिलने पर आवेदक बेरोजगारी भत्ते का हकदार हो जाता है। विकल्प A गलत है क्योंकि पचास दिन अधिनियम के किसी प्रावधान से मेल नहीं खाते, यद्यपि सूखा या प्राकृतिक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में सौ से अधिक दिन कभी-कभी स्वीकृत किए जाते रहे हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि पचहत्तर दिन की कोई गारंटी इस कानून में नहीं है। विकल्प D गलत है क्योंकि डेढ़ सौ दिन भी वैधानिक अधिकार नहीं है, और किसी राहत घोषणा को अधिनियम का प्रावधान मान लेना अभ्यर्थियों की आम भूल है।
2009 में गरीबी रेखा से कैलोरी मानक का आधार हटाने की सिफारिश करने वाले विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष कौन थे?
- A.डी. टी. लकड़वाला
- B.सुरेश तेंदुलकर
- C.सी. रंगराजन
- D.वाई. के. अलघ
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. सुरेश तेंदुलकर
व्याख्या
सही उत्तर B, सुरेश तेंदुलकर है। तेंदुलकर विशेषज्ञ समूह ने 2009 में रिपोर्ट दी, कैलोरी आधार छोड़ा, उपभोग के लिए मिश्रित संदर्भ अवधि अपनाई तथा स्वास्थ्य और शिक्षा पर निजी व्यय को टोकरी में शामिल किया, जिससे गरीबों का अनुमानित अनुपात बढ़ गया। विकल्प A गलत है क्योंकि 1993 के लकड़वाला विशेषज्ञ समूह ने कैलोरी आधारित रेखा बनाए रखी और उसका योगदान रेखाओं को राज्यवार बनाना तथा उन्हें औद्योगिक एवं कृषि श्रमिक मूल्य सूचकांकों से संशोधित करना था। विकल्प C गलत है क्योंकि रंगराजन विशेषज्ञ समूह ने तेंदुलकर के बाद 2014 में रिपोर्ट दी और ग्रामीण तथा नगरीय टोकरियां फिर अलग करते हुए रेखा ऊंची की। विकल्प D गलत है क्योंकि 1979 में वाई. के. अलघ के कार्यदल ने ही कैलोरी मानक तय किया था, जो पूछे गए उत्तर का उल्टा है।