भारत के संविधान के संबंध में मूल ढाँचा सिद्धांत संबंधित है 1. न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति से 2. केशवानंद भारती मामले (1973) के निर्णय से 3. भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 पर प्रतिबंधों से 4. गोलकनाथ मामले (1967) के निर्णय से नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- A.केवल 1, 2 और 3
- B.1, 2, 3 और 4
- C.केवल 1 और 3
- D.केवल 2 और 4
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है A, केवल 1, 2 और 3। मूल ढाँचा सिद्धांत केशवानंद भारती मामले में दिया गया, यह अनुच्छेद 368 के तहत संसद की शक्ति को सीमित करता है और न्यायिक पुनरावलोकन के माध्यम से लागू होता है; गोलकनाथ एक अलग और पहले का निर्णय था।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7-6 के बहुमत से कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, पर उसके मूल ढाँचे को नहीं बदल सकती। न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन से संशोधनों को इसी कसौटी पर परखते हैं, और मिनर्वा मिल्स (1980) में न्यायिक पुनरावलोकन को भी मूल ढाँचे का भाग माना गया। गोलकनाथ (1967) में न्यायालय ने कहा था कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन ही नहीं कर सकती; केशवानंद ने इस मत को पलट दिया।
विकल्प B गलत है क्योंकि इसमें गोलकनाथ शामिल है, जिसने यह सिद्धांत नहीं दिया। विकल्प C गलत है क्योंकि इसमें केशवानंद ही छूट गया है। विकल्प D गलत है क्योंकि इसमें गोलकनाथ है और न्यायिक पुनरावलोकन व अनुच्छेद 368 छूट गए हैं।
परीक्षा टिप: गोलकनाथ 1967 = मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं; केशवानंद 1973 = मूल ढाँचे को छोड़ सब संशोधनीय।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंसंघ और यूनियन बनाने का अधिकार एक
- A.सभी को प्रत्याभूत अधिकार है
- B.केवल नागरिकों को प्रत्याभूत स्वतंत्रता का अधिकार है
- C.विधि के समक्ष समता का अधिकार है
- D.प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है
उत्तर देखें
संघ या यूनियन बनाने का अधिकार अनुच्छेद 19 का हिस्सा है, और अनुच्छेद 19 के अधिकार केवल भारत के नागरिकों को मिलते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- A.संघ और प्रत्येक राज्य सरकार अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करेगी।
- B.आयोग की सभी रिपोर्टें और उसकी सिफ़ारिशें केवल लोकसभा के समक्ष रखी जाएँगी।
- C.किसी मामले की जाँच करते समय आयोग को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
- D.आयोग को अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति है।
उत्तर देखें
यह कथन सही नहीं है, क्योंकि आयोग की रिपोर्टें राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाते हैं, केवल लोकसभा के समक्ष नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत में चुनावों के संचालन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही नहीं है/हैं? 1. निर्वाचक नामावलियाँ तैयार करने का उत्तरदायित्व भारत के निर्वाचन आयोग में निहित है। 2. चुनाव की तिथि घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है। 3. निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित कानून भारत का निर्वाचन आयोग बनाता है। 4. किसी भी चुनाव को चुनाव याचिका के अलावा किसी अन्य प्रकार से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- A.केवल 3
- B.1, 2 और 4
- C.1, 2 और 3
- D.केवल 4
उत्तर देखें
केवल कथन 3 गलत है, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से जुड़े कानून संसद बनाती है, निर्वाचन आयोग नहीं। अनुच्छेद 327 संसद को चुनाव से संबंधित सभी विषयों पर कानून बनाने की शक्ति देता है, जिनमें निर्वाचक नामावली और परिसीमन भी शामिल हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत के संविधान की नौवीं अनुसूची के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- A.इसे संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था।
- B.नौवीं अनुसूची में शामिल अधिनियम और विनियम इस आधार पर शून्य हो जाएँगे कि वे संविधान के भाग III के किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
- C.मूल ढाँचे के सिद्धांत के आधार पर नौवीं अनुसूची में शामिल किसी अधिनियम का न्यायिक पुनर्विलोकन करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय के पास है।
- D.उपयुक्त विधानमंडल नौवीं अनुसूची में शामिल किसी अधिनियम को निरस्त या संशोधित कर सकता है।
उत्तर देखें
यह कथन सही नहीं है, क्योंकि अनुच्छेद 31B ठीक उलटी बात कहता है: नौवीं अनुसूची में रखा गया कोई अधिनियम केवल इस आधार पर शून्य नहीं होगा कि वह भाग III के किसी मौलिक अधिकार से असंगत है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारत के संविधान की छठी अनुसूची निम्नलिखित में से किन राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है?
- A.असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम
- B.मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर और मिज़ोरम
- C.असम, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा
- D.मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश
उत्तर देखें
छठी अनुसूची ठीक इन्हीं चार पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है। अनुच्छेद 244(2) और 275(1) के अंतर्गत छठी अनुसूची इन राज्यों में स्वायत्त ज़िले और स्वायत्त क्षेत्र बनाती है।
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