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GK24
भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

1998 के तृतीय न्यायाधीश वाद के बाद उच्चतम न्यायालय की नियुक्तियों की सिफारिश करने वाले कॉलेजियम में मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त कितने न्यायाधीश होते हैं?

  1. A.दो वरिष्ठतम न्यायाधीश
  2. B.तीन वरिष्ठतम न्यायाधीश
  3. C.चार वरिष्ठतम न्यायाधीश
  4. D.पांच वरिष्ठतम न्यायाधीश

सही उत्तर

C. चार वरिष्ठतम न्यायाधीश

व्याख्या

सही उत्तर C, चार वरिष्ठतम न्यायाधीश है। 1993 के द्वितीय न्यायाधीश वाद ने मुख्य न्यायमूर्ति से अपेक्षा की थी कि वे अपने दो वरिष्ठतम सहयोगियों से परामर्श करके राय बनाएं, इसलिए पहले कॉलेजियम में तीन सदस्य थे। 1998 में राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के अंतर्गत निर्देश भेजा और तृतीय न्यायाधीश वाद में न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय की नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम को मुख्य न्यायमूर्ति तथा चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों तक बढ़ाया और राय लिखित रूप में अभिलिखित करने का निर्देश दिया। विकल्प A गलत है क्योंकि दो सहयोगियों की संख्या 1993 की स्थिति है, जो अब भी उच्च न्यायालय की नियुक्तियों पर लागू है। विकल्प B और D गलत हैं क्योंकि तीन या पांच की संख्या इस प्रयोजन के लिए कभी निर्धारित नहीं हुई। इसी निर्णय ने यह भी कहा कि यदि दो वरिष्ठ न्यायाधीश किसी नाम पर असहमत हों तो मुख्य न्यायमूर्ति वह सिफारिश सरकार को न भेजें, जिससे कॉलेजियम की सामूहिक प्रकृति स्पष्ट हुई।

पूरा लेख पढ़ें: न्यायाधीशों की नियुक्ति: कॉलेजियम, एनजेएसी और अनुच्छेद 124

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Q1.भारतीय राजव्यवस्थाआसान

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत होती है?

  1. A.अनुच्छेद 122
  2. B.अनुच्छेद 124
  3. C.अनुच्छेद 127
  4. D.अनुच्छेद 217
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. अनुच्छेद 124

व्याख्या

सही उत्तर B, अनुच्छेद 124 है। अनुच्छेद 124(1) उच्चतम न्यायालय की स्थापना करता है और अनुच्छेद 124(2) कहता है कि उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के उन न्यायाधीशों से परामर्श के बाद करेगा जिन्हें वह आवश्यक समझे; इसके परंतुक के अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श अनिवार्य है। विकल्प A गलत है क्योंकि अनुच्छेद 122 न्यायालयों को संसद की कार्यवाही की जांच करने से रोकता है। विकल्प C गलत है क्योंकि अनुच्छेद 127 उच्चतम न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। विकल्प D गलत है क्योंकि अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है, जो भिन्न उपबंध है।

Q2.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने पहली बार कहा कि अनुच्छेद 124 में "परामर्श" शब्द का अर्थ "सहमति" नहीं है?

  1. A.एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)
  2. B.उच्चतम न्यायालय अधिवक्ता ऑन रिकॉर्ड संघ बनाम भारत संघ (1993)
  3. C.तृतीय न्यायाधीश वाद (1998)
  4. D.केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
उत्तर देखें
सही उत्तर: A. एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)

व्याख्या

सही उत्तर A, एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981) है, जिसे प्रथम न्यायाधीश वाद कहा जाता है। न्यायालय ने "परामर्श" का शब्दिक अर्थ लेकर कहा कि मुख्य न्यायमूर्ति की राय सरकार पर बाध्यकारी नहीं है, अतः नियुक्तियों में अंतिम निर्णय सरकार का ही रहा। विकल्प B गलत है क्योंकि 1993 के द्वितीय न्यायाधीश वाद ने इसी स्थिति को पलटा, परामर्श को सहमति माना, मुख्य न्यायमूर्ति को प्राथमिकता दी और कॉलेजियम बनाया। विकल्प C गलत है क्योंकि 1998 के तृतीय न्यायाधीश वाद ने राष्ट्रपति के निर्देश पर केवल कॉलेजियम का विस्तार मुख्य न्यायमूर्ति तथा चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों तक किया। विकल्प D गलत है क्योंकि केशवानंद भारती वाद ने आधारभूत ढांचे का सिद्धांत दिया और न्यायिक नियुक्तियों पर विचार नहीं किया। इस वाद को प्रथम न्यायाधीश वाद कहा जाता है और इसी के कारण 1981 से 1993 तक नियुक्तियों में कार्यपालिका की प्रधानता रही।

Q3.भारतीय राजव्यवस्थामध्यम

किस संविधान संशोधन अधिनियम ने अनुच्छेद 124क जोड़कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाया?

  1. A.सत्तानवेवां संशोधन अधिनियम
  2. B.निन्यानवेवां संशोधन अधिनियम
  3. C.एक सौ पहला संशोधन अधिनियम
  4. D.बयालीसवां संशोधन अधिनियम
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. निन्यानवेवां संशोधन अधिनियम

व्याख्या

सही उत्तर B, निन्यानवेवां संशोधन अधिनियम है, जो 2014 में पारित हुआ और जिसने अनुच्छेद 124क, 124ख तथा 124ग जोड़कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाया तथा संसद को विधि द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया नियमित करने की शक्ति दी। यह एनजेएसी अधिनियम, 2014 के साथ अप्रैल 2015 में प्रवृत्त हुआ और उसी वर्ष संविधान पीठ द्वारा रद्द कर दिया गया। विकल्प A गलत है क्योंकि सत्तानवेवां संशोधन सहकारी समितियों से संबंधित था और उसने भाग 9ख जोड़ा। विकल्प C गलत है क्योंकि एक सौ पहले संशोधन ने वस्तु और सेवा कर लागू किया। विकल्प D गलत है क्योंकि 1976 का बयालीसवां संशोधन "लघु संविधान" कहा जाता है और उसका न्यायिक नियुक्तियों से संबंध नहीं था। इसी संशोधन ने अनुच्छेद 124ग के द्वारा संसद को विधि बनाकर नियुक्ति की प्रक्रिया नियमित करने की शक्ति भी दी थी, और वह उपबंध भी 2015 में रद्द हुआ।

Q4.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

अनुच्छेद 124क के अनुसार निम्नलिखित में से कौन राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का सदस्य नहीं था?

  1. A.भारत के मुख्य न्यायमूर्ति
  2. B.केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री
  3. C.भारत के महान्यायवादी
  4. D.समिति द्वारा नामित दो ख्यातिप्राप्त व्यक्ति
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. भारत के महान्यायवादी

व्याख्या

सही उत्तर C, भारत के महान्यायवादी है, जो इस आयोग के सदस्य कभी नहीं थे। अनुच्छेद 124क ने आयोग को छह सदस्य दिए: पदेन अध्यक्ष के रूप में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति, उनके बाद के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री, तथा प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायमूर्ति और लोक सभा में विपक्ष के नेता की समिति द्वारा नामित दो ख्यातिप्राप्त व्यक्ति। इसलिए विकल्प A, B और D वास्तविक सदस्यों के नाम हैं और अपवाद पूछने वाले प्रश्न के लिए गलत उत्तर हैं। दोनों ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों में से एक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक या महिला वर्ग से होना आवश्यक था और उनका कार्यकाल तीन वर्ष का था। आयोग का सचिवालय विधि और न्याय मंत्रालय में रखा गया था, और यही बात आलोचना का मुख्य आधार बनी कि चयन संस्था पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ जाएगा।

Q5.भारतीय राजव्यवस्थाकठिन

2015 के चतुर्थ न्यायाधीश वाद में निन्यानवेवां संविधान संशोधन किस बहुमत से रद्द हुआ और किस न्यायाधीश ने असहमति दी?

  1. A.3:2, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की असहमति
  2. B.4:1, न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर की असहमति
  3. C.5:0, कोई असहमति नहीं
  4. D.4:3, न्यायमूर्ति मदन लोकुर की असहमति
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. 4:1, न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर की असहमति

व्याख्या

सही उत्तर B, 4:1, न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर की असहमति है। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि निन्यानवेवां संशोधन और एनजेएसी अधिनियम न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं, जो आधारभूत ढांचे का भाग है, मुख्यतः इसलिए कि न्यायाधीशों का चयन करने वाली संस्था में केंद्रीय विधि मंत्री तथा दो ख्यातिप्राप्त व्यक्ति बैठते। केवल न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने संशोधन को वैध ठहराया और कहा कि कॉलेजियम में पारदर्शिता नहीं है। विकल्प A गलत है क्योंकि पीठ में पांच न्यायाधीश थे और विभाजन तीन-दो नहीं था। विकल्प C गलत है क्योंकि निर्णय सर्वसम्मत नहीं था। विकल्प D गलत है क्योंकि पांच न्यायाधीशों की पीठ चार-तीन में बंट नहीं सकती और न्यायमूर्ति मदन लोकुर बहुमत में थे। पीठ ने अनुच्छेद 124ग को भी रद्द किया, जो संसद को विधि द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया नियमित करने की शक्ति देता था, और यह निर्णय आज न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रमुख उद्धरण है।