मुगलों की वह राजस्व व्यवस्था, जिसमें हर फसल के लिए राजस्व दरों की अपनी अलग सूची होती थी, क्या कहलाती थी?
- A.ज़ात
- B.इक्ता
- C.जागीर
- D.ज़ब्त
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. ज़ब्त
व्याख्या
सही उत्तर है D, ज़ब्त। अकबर के समय हर प्रांत को राजस्व मंडलों में बाँटा गया और हर मंडल के लिए अलग-अलग फसलों की राजस्व दरों की अपनी सूची बनी; इसी व्यवस्था को ज़ब्त कहा गया। अकबर के राजस्व मंत्री टोडरमल ने 1570 से 1580 तक दस वर्षों की फसल की पैदावार, कीमतों और जोती गई ज़मीन का सावधानी से सर्वेक्षण कराया। इन आँकड़ों के आधार पर हर फसल पर नकद कर तय किया गया। ज़ब्त वहीं लागू हो सका जहाँ मुगल अधिकारी ज़मीन का सर्वेक्षण कर पाते और पक्का हिसाब रख पाते, इसलिए गुजरात और बंगाल जैसे प्रांतों में यह संभव नहीं था। A गलत है क्योंकि ज़ात मनसबदार का पद था, जिससे उसका दर्जा और वेतन तय होता था, यह कर व्यवस्था नहीं थी। B गलत है क्योंकि इक्ता दिल्ली सल्तनत के समय की भूमि-सौंप थी, जिसके धारक इक्तादार या मुक्ती कहलाते थे। C गलत है क्योंकि जागीर वह राजस्व-सौंप थी जो मनसबदार को नकद वेतन के बदले दी जाती थी। परीक्षा टिप: टोडरमल, 1570 से 1580 का दस वर्षीय सर्वेक्षण, हर फसल की नकद दर = ज़ब्त।