प्राचीन दक्षिण भारत के संदर्भ में 'विचित्रचित्त', 'चित्रकारपुलि' और 'चैत्यकारी' शब्द किसे संदर्भित करते हैं?
- A.बाज़ार
- B.मंदिर
- C.उपाधियां
- D.रंग बनाने के केंद्र
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है C, उपाधियां। विचित्रचित्त, चित्रकारपुलि और चैत्यकारी सातवीं शताब्दी के आरंभ में शासन करने वाले पल्लव राजा महेंद्रवर्मन प्रथम की उपाधियां (बिरुद) थीं।
महेंद्रवर्मन प्रथम बहुमुखी प्रतिभा के शासक थे और हर उपाधि उनकी एक प्रतिभा दिखाती है। विचित्रचित्त का अर्थ है जिज्ञासु या अनोखे विचारों वाला; चित्रकारपुलि का अर्थ है चित्रकारों में बाघ, जो चित्रकला के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है; चैत्यकारी का अर्थ है देवालय बनाने वाला, क्योंकि उन्होंने तमिल क्षेत्र में चट्टान काटकर मंदिर बनाने की परंपरा शुरू की, जैसे मंडगपट्टु में, जहां उनके अभिलेख में लिखा है कि यह मंदिर ईंट, लकड़ी, धातु और गारे के बिना बना। उन्होंने संस्कृत प्रहसन मत्तविलास प्रहसन भी लिखा और मत्तविलास व गुणभर जैसी उपाधियां धारण कीं।
A गलत है: ये शब्द राजा के व्यक्तिगत विशेषण हैं, व्यापारिक स्थानों के नाम नहीं।
B गलत है: चैत्यकारी मंदिर बनाने वाले को कहते हैं, पर ये तीनों शब्द मंदिरों के नाम नहीं हैं।
D गलत है: चित्रकारपुलि राजा की चित्रकार के रूप में प्रशंसा है; कोई भी शब्द रंग बनाने के स्थान का नाम नहीं है।
Exam tip: महेंद्रवर्मन प्रथम: विचित्रचित्त, चित्रकारपुलि, चैत्यकारी, मत्तविलास; मत्तविलास प्रहसन के लेखक।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंतत्त्वबोधिनी पत्रिका के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- A.इसने बांग्ला भाषा में भारत के अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया।
- B.इसने संस्कृत स्रोतों के माध्यम से भारत के अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया।
- C.इसने फ़ारसी स्रोतों के माध्यम से भारत के अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया।
- D.इसने पश्चिमी स्रोतों के माध्यम से भारत के अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया।
उत्तर देखें
तत्त्वबोधिनी पत्रिका ने बांग्ला भाषा में भारत के अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया। यह पत्रिका 1843 में रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने तत्त्वबोधिनी सभा के मुखपत्र के रूप में शुरू की थी, जिसकी स्थापना उन्होंने 1839 में की थी।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भक्ति आंदोलन के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- A.भक्ति आंदोलन ने विविधता को बढ़ावा देने वाली परंपराओं से परहेज़ किया
- B.उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन राम और कृष्ण की उपासना के इर्द-गिर्द केंद्रित था
- C.भक्ति आंदोलन सगुण और निर्गुण, दोनों प्रकार की ईश्वर भक्ति पर आधारित था
- D.जहां तुलसीदास सगुण भक्ति परंपरा के प्रतिनिधि थे, वहीं संत कबीर ने निर्गुण भक्ति का मार्ग अपनाया
उत्तर देखें
भक्ति आंदोलन ने विविधता से परहेज़ नहीं किया, बल्कि अनेक क्षेत्रीय भाषाओं, संप्रदायों और सामाजिक समूहों को अपनाया, इसलिए यही कथन गलत है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन भारत का अंतिम गवर्नर-जनरल था, जिसके बाद यह पद स्थायी रूप से समाप्त कर दिया गया?
- A.लॉर्ड माउंटबेटन
- B.चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
- C.लॉर्ड वेवेल
- D.लॉर्ड लिनलिथगो
उत्तर देखें
वे जून 1948 से 26 जनवरी 1950 तक इस पद पर रहे, जब भारत गणराज्य बना और इस पद की जगह राष्ट्रपति का पद आया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. इसने विधि-निर्माण के प्रयोजन से गवर्नर जनरल की परिषद का विस्तार किया।
2. गवर्नर जनरल को सदस्यों की संख्या बढ़ाने का अधिकार नहीं दिया गया था।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A.केवल 1
- B.केवल 2
- C.1 और 2 दोनों
- D.न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
1861 के अधिनियम ने विधि-निर्माण के लिए गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में अतिरिक्त सदस्य जोड़कर उसका विस्तार किया, और इन सदस्यों को गवर्नर जनरल ही नामित करता था।
पूरी व्याख्या पढ़ें →निम्नलिखित में से कौन-सा वह तरीका नहीं था जिससे प्राचीन भारत के राजाओं ने उच्च स्थिति का दावा करने का प्रयास किया?
- A.विभिन्न देवताओं से स्वयं को जोड़ना
- B.आडंबरपूर्ण उपाधियां धारण करना
- C.ऊंचे कर लगाना
- D.विजय और क्षेत्रों का विलय
उत्तर देखें
कर राज्य चलाने के लिए राजस्व का साधन थे, उच्च प्रतिष्ठा जताने का तरीका नहीं। प्राचीन भारतीय राजाओं ने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के कई उपाय अपनाए।
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