जल शक्ति मंत्रालय का गठन 2019 में किन दो मंत्रालयों को मिलाकर किया गया?
- A.कृषि, तथा ग्रामीण विकास
- B.जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण, तथा पेयजल एवं स्वच्छता
- C.पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन, तथा पृथ्वी विज्ञान
- D.आवासन और शहरी कार्य, तथा पंचायती राज
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर B है। वर्ष 2019 में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय में मिलाकर एक जल शक्ति मंत्रालय बनाया गया, जिससे सिंचाई, नदी बेसिन, भूजल, पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता का काम एक ही मंत्रालय के अधीन आ जाए। यह दो विभागों से चलता है - जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग तथा पेयजल और स्वच्छता विभाग - और जल जीवन मिशन, जल शक्ति अभियान तथा अटल भूजल योजना इसके अंतर्गत चलते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि कृषि और ग्रामीण विकास अलग मंत्रालय बने हुए हैं, यद्यपि जलग्रहण क्षेत्र विकास का काम ग्रामीण विकास के अधीन होता है। विकल्प C गलत है क्योंकि पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालयों का विलय नहीं हुआ; वे वन, प्रदूषण और मौसम सेवाओं का काम देखते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि शहरी जलापूर्ति शहरी कार्य मंत्रालय से होती है, परंतु ऐसा कोई विलय नहीं हुआ।
पूरा लेख पढ़ें: जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन: पारंपरिक संरचनाएं और योजनाएं
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंराजस्थान में टांका और खड़ीन किस प्रकार के हैं?
- A.पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों के
- B.पारंपरिक युद्ध कौशल के
- C.पारंपरिक लोक नृत्यों के
- D.पारंपरिक कृषि पद्धति के
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व्याख्या
सही उत्तर A, पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों के है। टांका पश्चिमी राजस्थान में आंगन के नीचे या घर के भीतर बना ढका हुआ भूमिगत टैंक है, जिसमें पक्के आंगन या छत पर गिरी वर्षा छननी से होकर जमा होती है और सूखे महीनों में पेयजल का काम देती है। खड़ीन पंद्रहवीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित पद्धति है, जिसमें पथरीले जलग्रहण ढाल के निचले भाग में लंबा मिट्टी का बांध बनाया जाता है; बहाव का पानी उसके पीछे रुकता है, मिट्टी को भिगोता है और पानी उतरने के बाद नम भूमि पर फसल ली जाती है। इस प्रकार दोनों मरुस्थल की पारंपरिक जल संचयन संरचनाओं के परिवार में आते हैं, जिसमें कुंड, जोहड़ और बावड़ी भी शामिल हैं। विकल्प B गलत है क्योंकि इन शब्दों का युद्ध से कोई संबंध नहीं है। विकल्प C गलत है क्योंकि राजस्थान के लोक नृत्य घूमर, कालबेलिया, तेरह ताली और चरी हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि खड़ीन से खेती होती है, फिर भी संरचना स्वयं जल संचयन कार्य है और टांका का कृषि से कोई अर्थ नहीं है।
वर्षा जल संचयन की जाबो पद्धति किस राज्य में प्रचलित है?
- A.मेघालय
- B.नागालैंड
- C.मिजोरम
- D.मणिपुर
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व्याख्या
सही उत्तर B, नागालैंड है। जाबो शब्द का अर्थ ही बहाव को रोकना है और यह पद्धति नागालैंड के फेक जिले के किक्रुमा गांव के आसपास प्रचलित है। पहाड़ी की चोटी पर सुरक्षित वन क्षेत्र में गिरी वर्षा बीच की सीढ़ी पर बने तालाबों में रोकी जाती है, वहां से पशुबाड़ों से होकर बहती है जहां उसमें गोबर के पोषक तत्व मिल जाते हैं, और अंत में नीचे के धान के खेतों तक पहुंचती है जिनमें मछली भी पाली जाती है। इस प्रकार वन, जल, पशुधन और फसल एक जुड़ी हुई व्यवस्था के रूप में संभाले जाते हैं। विकल्प A गलत है क्योंकि मेघालय की पहचान बांस टपक सिंचाई से है, जिसमें चीरे हुए बांस की नलियों से झरने का पानी खासी और जयंतिया पहाड़ियों में पान की बेल तथा काली मिर्च तक बूंद-बूंद पहुंचाया जाता है। विकल्प C गलत है क्योंकि मिजोरम बांस के वनों और झूम खेती के लिए जाना जाता है। विकल्प D गलत है क्योंकि मणिपुर इस अध्याय में लोकटक झील और तैरते फुमदी के लिए जाना जाता है।
बांस टपक सिंचाई, जिसमें चीरे हुए बांस की नलियों से झरने का पानी खेतों तक पहुंचाया जाता है, किस राज्य की पारंपरिक पद्धति है?
- A.मेघालय
- B.केरल
- C.लद्दाख
- D.बिहार
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व्याख्या
सही उत्तर A, मेघालय है। खासी और जयंतिया पहाड़ियों में ढाल पर मौजूद झरने और नाले का पानी बांस की चीरी हुई नलियों, नालियों और मोड़ने वाली लकड़ियों के जाल से नीचे उतारा जाता है, और अंत में पान की बेल या काली मिर्च के पौधे की जड़ पर बूंद-बूंद छोड़ा जाता है। इस व्यवस्था में सीमेंट, पंप और बिजली की कोई आवश्यकता नहीं होती, और यह संसार की सबसे पुरानी सूक्ष्म सिंचाई विधियों में गिनी जाती है। विकल्प B गलत है क्योंकि इस अध्याय में केरल की पहचान सुरंगम से है, जो लैटेराइट पहाड़ी में क्षैतिज सुरंग खोदकर रिसाव का पानी लेने की विधि है, तथा वायनाड के लकड़ी के बेलनाकार पनम केनी कुएं से है। विकल्प C गलत है क्योंकि लद्दाख जिंग से जुड़ा है, जो हिमनद के पिघले जल को रोकने वाला छोटा टैंक है। विकल्प D गलत है क्योंकि दक्षिण बिहार आहर-पईन प्रणाली का क्षेत्र है।
दक्षिण बिहार की पारंपरिक आहर-पईन प्रणाली में पईन क्या है?
- A.बहाव का पानी रोकने वाला बंधा जलाशय
- B.नदी से पानी लाने वाली मोड़ नहर
- C.ढका हुआ भूमिगत पेयजल टैंक
- D.जलस्तर तक उतरने वाला सीढ़ीदार कुआं
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व्याख्या
सही उत्तर B, नदी से पानी लाने वाली मोड़ नहर है। प्राचीन मगध यानी दक्षिण बिहार में भूमि का ढाल मंद है और मिट्टी पानी कम रोकती है, इसलिए किसानों ने फल्गु, सकरी और मोरहर जैसी नदियों के बहाव से लंबी नहरें, अर्थात पईन, निकालकर पानी खेतों तक पहुंचाया। विकल्प A गलत है क्योंकि पईन के सिरे पर बना तीन ओर से बंधा जलाशय आहर कहलाता है, जिसका चौथा किनारा भूमि का प्राकृतिक ढाल होता है; आहर और पईन को आपस में बदल देना इस प्रश्न का सामान्य जाल है। विकल्प C गलत है क्योंकि ढका हुआ भूमिगत पेयजल टैंक पश्चिमी राजस्थान का टांका है। विकल्प D गलत है क्योंकि जलस्तर तक उतरने वाला सीढ़ीदार कुआं राजस्थान और गुजरात की बावड़ी या वाव है, जिसमें पाटन की रानी की वाव सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसलिए आहर-पईन का जोड़ा जलाशय और नहर, दोनों को मिलाकर बनता है।
हिमनद के पिघले जल को एकत्र करने के लिए बनाया जाने वाला छोटा टैंक जिंग किस क्षेत्र की पारंपरिक संरचना है?
- A.हिमाचल प्रदेश
- B.उत्तराखंड
- C.लद्दाख
- D.सिक्किम
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व्याख्या
सही उत्तर C, लद्दाख है। लद्दाख के शीत मरुस्थल में वर्षा बहुत कम होती है, इसलिए वहां काम का पानी हिमनद के पिघलने से मिलता है। मार्गदर्शी नालियां हिमनद के छोर से पिघला जल नीचे खेतों के पास बने जिंग तक लाती हैं, जहां वह दोपहर तक रोका जाता है, क्योंकि तब तक पिघलने की मात्रा सिंचाई के योग्य हो जाती है। गांव का जल अधिकारी, जिसे चुरपुन कहते हैं, यह पानी घरों में बांटता है। विकल्प A गलत है क्योंकि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र की संरचना कुहल है, जो हिमनद और नाले का पानी सीढ़ीदार खेतों तक सीधे ले जाती है, टैंक में संचित नहीं करती; जिंग और कुहल को बदल देना यहां सबसे आम गलती है। विकल्प B गलत है क्योंकि उत्तराखंड गूल नालियों और चाल-खाल तालाबों से जुड़ा है। विकल्प D गलत है क्योंकि सिक्किम में वर्षा बहुत अधिक होती है और वह ऐसे किसी पिघल जल टैंक से नहीं जाना जाता।