आरंभिक राष्ट्रवादियों ने 1892 के परिषद अधिनियम का विरोध क्यों किया?
- A.शाही विधान परिषद के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई थी
- B.प्रांतीय परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई थी
- C.परिषदों को वार्षिक बजट पर चर्चा करने का अधिकार दिया गया था
- D.इस अधिनियम ने भारतीयों को सार्वजनिक धन पर नियंत्रण नहीं दिया था
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है D, इस अधिनियम ने भारतीयों को सार्वजनिक धन पर नियंत्रण नहीं दिया था। परिषदें बजट पर चर्चा कर सकती थीं, पर उस पर मतदान या संशोधन नहीं कर सकती थीं।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 ने शाही और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाई और नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों और विश्वविद्यालयों जैसी संस्थाओं की सिफ़ारिश से अप्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था शुरू की। सदस्य वार्षिक बजट पर चर्चा कर सकते थे और प्रश्न पूछ सकते थे, पर पूरक प्रश्न नहीं पूछ सकते थे और बजट पर मतदान नहीं कर सकते थे। कांग्रेस के आरंभिक राष्ट्रवादियों ने परिषदों के थोड़े विस्तार का स्वागत किया, पर अधिनियम को पूरी तरह अपर्याप्त बताया: सरकारी बहुमत बना रहा, परिषदें केवल सलाहकारी रहीं, और सार्वजनिक धन के संग्रह और खर्च पर भारतीयों का कोई अधिकार नहीं था। इसी से उनका नारा बना, प्रतिनिधित्व के बिना कराधान नहीं।
A गलत है क्योंकि शाही परिषद का विस्तार राष्ट्रवादियों की अपनी माँग था, विरोध का कारण नहीं। B भी इसी कारण गलत है, प्रांतों के संदर्भ में। C गलत है क्योंकि बजट पर चर्चा का अधिकार सीमित ही सही, एक उपलब्धि था।
Exam tip: 1892 का अधिनियम: बजट पर चर्चा, पर मतदान नहीं; अप्रत्यक्ष चुनाव यहीं से शुरू होकर 1909 में औपचारिक बना।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंवासुदेव बलवंत फड़के इतिहास में किस लिए जाने जाते हैं?
- A.उन्होंने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेज़ों के विरुद्ध हिंसक संघर्ष का नेतृत्व किया
- B.वे गांधीवादी संघर्ष के आलोचक थे
- C.उन्होंने 1870 के दशक में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया
- D.वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र नेता थे
उत्तर देखें
फड़के ने 1879 में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए महाराष्ट्र में एक सशस्त्र दल खड़ा किया। वासुदेव बलवंत फड़के पुणे में सैन्य वित्त विभाग में लिपिक थे।
पूरी व्याख्या पढ़ें →मुगल बादशाहों की धार्मिक नीतियों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- A.तीर्थयात्रा कर 1563 में और गैर-मुस्लिम प्रजा पर जज़िया कर 1564 में समाप्त कर दिया गया
- B.अकबर ने अपने अधिकारियों को धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाने के निर्देश दिए
- C.सभी मुगल बादशाहों ने उपासना स्थलों के निर्माण और रखरखाव के लिए अनुदान नहीं दिए
- D.शाहजहाँ और औरंगज़ेब के शासनकाल में युद्ध के दौरान नष्ट हुए अनेक मंदिरों की मरम्मत के लिए अनुदान जारी किए गए
उत्तर देखें
वास्तव में सभी मुगल बादशाहों ने उपासना स्थलों के निर्माण और रखरखाव के लिए अनुदान दिए, इसलिए यह कहना गलत है कि सबने नहीं दिए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →सुलह-ए-कुल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. इसका अर्थ 'पूर्ण शांति' है
2. इसमें सभी धर्मों और विचार-संप्रदायों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई थी
3. सुलह-ए-कुल के आदर्श को राज्य की नीतियों के माध्यम से लागू किया गया था
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- A.केवल 1 और 2
- B.1, 2 और 3
- C.केवल 3
- D.केवल 2 और 3
उत्तर देखें
सुलह-ए-कुल, अकबर का पूर्ण शांति का आदर्श, हर धर्म को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता था और राज्य की नीतियों से व्यवहार में लाया गया।
पूरी व्याख्या पढ़ें →प्रार्थना समाज के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
1. इसका उद्देश्य हिंदू समाज में सुधार करना था
2. यह महाराष्ट्र में आधारित था
3. यह एकेश्वरवाद में विश्वास करता था
4. इसने ब्रह्म समाज को अत्यधिक प्रभावित किया था
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- A.केवल 1 और 2
- B.केवल 2 और 3
- C.1, 2 और 3
- D.1 और 4
उत्तर देखें
प्रार्थना समाज महाराष्ट्र की एकेश्वरवादी हिंदू सुधार संस्था थी, पर यह ब्रह्म समाज से प्रभावित थी, उसका उल्टा नहीं। प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 में बंबई में आत्माराम पांडुरंग ने की, जब ब्रह्म समाज के केशवचंद्र सेन की यात्रा से वहाँ के सुधारक प्रेरित हुए।
पूरी व्याख्या पढ़ें →जैन धर्म के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण विचार यह है कि सम्पूर्ण विश्व प्राणवान है, यहाँ तक कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन है।
2. कर्म के चक्र से स्वयं को मुक्त करने के लिए तपस्या और प्रायश्चित आवश्यक हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- A.केवल 1
- B.केवल 2
- C.1 और 2 दोनों
- D.न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें
जैन धर्म मानता है कि पूरी प्रकृति में जीवन है, और यह सिखाता है कि आत्मा कठोर आत्म-संयम से ही कर्म से मुक्त होती है।
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