नमामि गंगे: 31,327 करोड़ की 199 सीवरेज परियोजनाएं
नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत लगभग 31,327 करोड़ रुपये की 199 सीवरेज परियोजनाएं ली गईं, जिनमें 116 पूरी हो चुकी हैं और 2,237 एमएलडी क्षमता बनी है।

चर्चा में क्यों
21 अक्टूबर 2026 के एक सरकारी दस्तावेज में नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत अपशिष्ट जल शोधन की तकनीकों तथा सीवरेज परियोजनाओं और क्षमता की प्रगति का ब्योरा दिया गया।
21 अक्टूबर 2026 को जारी एक सरकारी दस्तावेज में बताया गया है कि नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत सीवेज का शोधन किस तरह किया जा रहा है। 2014 में शुरू हुआ यह एकीकृत संरक्षण मिशन राष्ट्रीय नदी गंगा के प्रदूषण पर रोक लगाने तथा उसके पुनरुद्धार के दोहरे उद्देश्य पर टिका है। इसके स्तंभों में सीवेज शोधन अवसंरचना, रिवर फ्रंट विकास, नदी सतह की सफाई, जैव विविधता, वनीकरण, जन जागरूकता, औद्योगिक अपशिष्ट निगरानी और गंगा ग्राम शामिल हैं।
अब तक की प्रगति
प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास के केंद्र में सीवेज शोधन है। कार्यक्रम के तहत 199 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाएं ली गई हैं, जिनकी अनुमानित लागत 31,327 करोड़ रुपये है और इनमें से 116 पूरी हो चुकी हैं।
| नई एसटीपी क्षमता का लक्ष्य | 5,270 एमएलडी |
| अब तक बनी नई क्षमता | 2,237 एमएलडी |
| पुनरुद्धार का लक्ष्य | 925 एमएलडी |
| पुनरुद्धार पूर्ण | 873 एमएलडी |
तकनीक-तटस्थ दृष्टिकोण
मिशन किसी एक प्रक्रिया से बंधा नहीं है। शहर, उपलब्ध भूमि और सीवेज की प्रकृति के अनुसार इसमें पारंपरिक एक्टिवेटेड स्लज प्रक्रिया, अपफ्लो एनारोबिक स्लज ब्लैंकेट, सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर, मूविंग बेड बायोफिल्म रिएक्टर, फ्लुइडाइज्ड एरेटेड बेड और फूड चेन रिएक्टर के साथ इलेक्ट्रोकोएगुलेशन, निर्मित आर्द्रभूमि तथा पैकेज्ड इकाइयों का उपयोग होता है।
जमीन पर नई तकनीकें
फूड चेन रिएक्टर इसी मिशन के जरिये भारत आया। इसमें स्थिर कृत्रिम माध्यम और पौधों की जड़ें जोड़ी जाती हैं, जिससे कम जमीन और कम बिजली लगती है। ऐसे पांच संयंत्र चल रहे हैं, दो पश्चिम बंगाल के भाटपाड़ा में और तीन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में, जबकि एक बिहार के भागलपुर में बन रहा है जिसमें प्रति एमएलडी लगभग 175 वर्ग मीटर जगह लगेगी। उत्तराखंड की पहाड़ियों में, जहां ठंड और कठिन पहुंच अन्य तरीकों को रोक देती है, बद्रीनाथ और चमोली जैसे स्थानों पर इलेक्ट्रोकोएगुलेशन इकाइयां लगाई गई हैं।
ऊपर की ओर और प्रकृति के साथ
चंद्रेश्वर नगर के मुनि की रेती में देश का पहला चार मंजिला नगरीय सीवेज शोधन संयंत्र इसी मिशन के तहत बना है। जमीन की कमी के कारण 7.5 एमएलडी का यह संयंत्र लगभग 900 वर्ग मीटर में खड़ा किया गया और इसमें प्रति एमएलडी लगभग 120 वर्ग मीटर जगह लगी, जबकि पारंपरिक विकल्प में यह लगभग 400 वर्ग मीटर होती। उत्तर प्रदेश के बिठूर में, जहां की आबादी लगभग 20,000 है, नालों पर ही बनी छह निर्मित आर्द्रभूमियां करीब 2 एमएलडी जल का शोधन करती हैं और इनसे बीओडी लगभग 75 मिलीग्राम प्रति लीटर से घटकर 10 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे आ गई है।
महत्वपूर्ण तथ्य
| कार्यक्रम | नमामि गंगे कार्यक्रम, 2014 में शुरू |
|---|---|
| उद्देश्य | राष्ट्रीय नदी गंगा का प्रदूषण नियंत्रण और पुनरुद्धार |
| सीवरेज परियोजनाएं | लगभग 31,327 करोड़ रुपये की 199 परियोजनाएं, 116 पूर्ण |
| नई एसटीपी क्षमता | 5,270 एमएलडी लक्ष्य में से 2,237 एमएलडी निर्मित |
| पुनरुद्धार | 925 एमएलडी लक्ष्य में से 873 एमएलडी पूर्ण |
| फूड चेन रिएक्टर संयंत्र | भाटपाड़ा, पश्चिम बंगाल में दो और प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में तीन |
| पहला चार मंजिला नगरीय एसटीपी | मुनि की रेती, चंद्रेश्वर नगर, 7.5 एमएलडी, लगभग 900 वर्ग मीटर |
| निर्मित आर्द्रभूमि | बिठूर, उत्तर प्रदेश में छह आर्द्रभूमियां, लगभग 2 एमएलडी |
परीक्षा की दृष्टि से
नमामि गंगे का आरंभ वर्ष (2014), सीवरेज परियोजनाओं की संख्या और लागत (199 परियोजनाएं, 31,327 करोड़ रुपये), क्षमता के आंकड़े (5,270 एमएलडी लक्ष्य, 2,237 एमएलडी निर्मित, 925 और 873 एमएलडी पुनरुद्धार), फूड चेन रिएक्टर के स्थान तथा मुनि की रेती का पहला चार मंजिला एसटीपी याद रखें।
अभ्यास प्रश्न
नमामि गंगे कार्यक्रम किस वर्ष शुरू किया गया था?
- A.2011
- B.2014
- C.2016
- D.2019
उत्तर देखें
नमामि गंगे कार्यक्रम इसी वर्ष एकीकृत संरक्षण मिशन के रूप में शुरू हुआ, जिसके दोहरे उद्देश्य प्रदूषण पर प्रभावी रोक तथा राष्ट्रीय नदी गंगा का संरक्षण और पुनरुद्धार हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ें →नमामि गंगे के तहत बना देश का पहला चार मंजिला नगरीय सीवेज शोधन संयंत्र कहां है?
- A.प्रयागराज
- B.भाटपाड़ा
- C.मुनि की रेती
- D.बिठूर
उत्तर देखें
वहां जमीन की कमी, तीन सीवेज नाले और एक वर्षाजल नाला होने से पारंपरिक निर्माण कठिन था, इसलिए संयंत्र को ऊपर की ओर बहुमंजिला बनाया गया और प्रति एमएलडी जमीन की आवश्यकता पारंपरिक विकल्प से काफी कम रह गई।
पूरी व्याख्या पढ़ें →नमामि गंगे के जरिये भारत आई कौन सी तकनीक स्थिर कृत्रिम माध्यम और पौधों की जड़ों का उपयोग करती है तथा जिसके संयंत्र भाटपाड़ा और प्रयागराज में हैं?
- A.फूड चेन रिएक्टर
- B.जोकासो
- C.इलेक्ट्रोकोएगुलेशन
- D.अपफ्लो एनारोबिक स्लज ब्लैंकेट
उत्तर देखें
यह तकनीक इसी कार्यक्रम के माध्यम से भारत में आई और यह एक्टिवेटेड स्लज प्रक्रिया तथा सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर में स्थिर कृत्रिम माध्यम और पौधों की जड़ें जोड़कर सुधार करती है, जिससे कम जगह, कम बिजली और पोषक तत्वों का निष्कासन संभव होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ें →अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नमामि गंगे कार्यक्रम कब शुरू हुआ और इसके उद्देश्य क्या हैं?
यह 2014 में एकीकृत संरक्षण मिशन के रूप में शुरू हुआ, जिसके दोहरे उद्देश्य प्रदूषण पर प्रभावी रोक तथा राष्ट्रीय नदी गंगा का संरक्षण और पुनरुद्धार हैं।
कार्यक्रम के तहत कितनी सीवेज शोधन क्षमता बनी है?
5,270 एमएलडी नई एसटीपी क्षमता के लक्ष्य में से अब तक 2,237 एमएलडी बनाई जा चुकी है, तथा 925 एमएलडी पुनरुद्धार लक्ष्य में से 873 एमएलडी का पुनरुद्धार हो चुका है।
नमामि गंगे के तहत देश का पहला चार मंजिला नगरीय एसटीपी कहां है?
चंद्रेश्वर नगर के मुनि की रेती में। 7.5 एमएलडी का यह संयंत्र लगभग 900 वर्ग मीटर में है और इसमें प्रति एमएलडी लगभग 120 वर्ग मीटर जगह लगी, जबकि पारंपरिक विकल्प में लगभग 400 वर्ग मीटर लगती।
स्रोत
- https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2325989 (नए टैब में खुलेगा) — Press Information Bureau
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