हाल ही में चर्चा में रहे 'LiFi' के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? 1. यह उच्च गति डेटा संचरण के लिए प्रकाश को माध्यम के रूप में उपयोग करता है। 2. यह एक बेतार प्रौद्योगिकी है और 'WiFi' से कई गुना तेज़ है। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- A.केवल 1
- B.केवल 2
- C.1 और 2 दोनों
- D.न तो 1, न ही 2
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है C, 1 और 2 दोनों। LiFi (लाइट फिडेलिटी) LED प्रकाश को इतनी तेज़ी से जलाकर-बुझाकर डेटा भेजता है कि आँख उसे पकड़ नहीं पाती, और यह WiFi से कई गुना तेज़ हो सकता है।
इस विचार को 2011 में एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हेराल्ड हास ने लोकप्रिय बनाया। LiFi बल्ब बहुत अधिक आवृत्ति पर टिमटिमाता है और एक फोटोडिटेक्टर इन बदलावों को बाइनरी डेटा के रूप में पढ़ता है। दृश्य प्रकाश का स्पेक्ट्रम WiFi की रेडियो तरंगों से कहीं चौड़ा है, इसलिए प्रयोगशाला परीक्षणों में WiFi से कई गुना अधिक गति मिली है। प्रकाश दीवारों के पार नहीं जाता, जिससे दूरी सीमित रहती है पर सिग्नल सुरक्षित रहता है और रेडियो हस्तक्षेप नहीं होता; यह अस्पतालों और विमानों में उपयोगी है।
A गलत है, क्योंकि कथन 2 भी सही है।
B गलत है, क्योंकि प्रकाश का उपयोग ही LiFi का आधार है।
D गलत है, क्योंकि दोनों कथन LiFi का सही वर्णन करते हैं।
परीक्षा टिप: WiFi रेडियो तरंगों से, LiFi LED के दृश्य प्रकाश से चलता है और दीवार के पार नहीं जाता।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंहिमनद अनुसंधान के लिए भारत का उच्च तुंगता केंद्र हिमांश किस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में है?
- A.उत्तराखंड
- B.हिमाचल प्रदेश
- C.सिक्किम
- D.लद्दाख
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व्याख्या
सही उत्तर B, हिमाचल प्रदेश है। हिमांश 2016 में हिमाचल प्रदेश के स्पीति क्षेत्र में, चंद्रा द्रोणी के ऊपरी भाग में स्थापित हुआ, जिससे वैज्ञानिक हिमालयी हिमनदों का द्रव्यमान संतुलन, पिघलन और संचलन केवल छोटे दौरों में नहीं, बल्कि साल भर माप सकें। हिमालयी हिममंडल को प्रायः तीसरा ध्रुव कहा जाता है, इसीलिए यह केंद्र ध्रुवीय केंद्रों के उसी कार्यक्रम में आता है।
विकल्प A, उत्तराखंड, में गंगोत्री सहित अनेक अध्ययनाधीन हिमनद हैं, पर यह केंद्र वहाँ नहीं है। विकल्प C, सिक्किम, और विकल्प D, लद्दाख, में भी निगरानी वाले हिमनद हैं पर इस नाम का कोई केंद्र नहीं। हिमालय के हिमांश को आर्कटिक के हिमाद्रि से न मिलाएँ; दोनों नामों में थोड़ा ही अंतर है और ये दो केंद्र इस विषय के दो छोर हैं, एक 2008 से स्वालबार्ड में और दूसरा 2016 से स्पीति में।
बहुधात्विक पिंडों के अन्वेषण के लिए भारत को आवंटित क्षेत्र महासागर के किस भाग में है?
- A.मध्य हिंद महासागर द्रोणी
- B.बंगाल की खाड़ी का महाद्वीपीय शेल्फ़
- C.अरब सागर का महाद्वीपीय शेल्फ़
- D.प्रशांत का क्लैरियन-क्लिपर्टन क्षेत्र
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व्याख्या
सही उत्तर A, मध्य हिंद महासागर द्रोणी है। भारत वर्ष 1987 में अंतरराष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण से अग्रणी निवेशक दर्जा पाने वाला पहला देश था, और उसके पास बहुधात्विक पिंडों के लिए मध्य हिंद महासागर द्रोणी में पचहत्तर हज़ार वर्ग किलोमीटर का अन्वेषण क्षेत्र है; ये पिंड गहरी तलहटी पर पड़े ढेले हैं जिनमें मैंगनीज़, निकल, कोबाल्ट और ताँबा भरपूर होता है।
विकल्प B, बंगाल की खाड़ी का शेल्फ़, और विकल्प C, अरब सागर का शेल्फ़, भारत के ही समुद्री क्षेत्र में पड़ते हैं और उथले महाद्वीपीय शेल्फ़ हैं, जहाँ इस तरह के पिंड नहीं बनते; वे मत्स्य और हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र हैं। विकल्प D, प्रशांत का क्लैरियन-क्लिपर्टन क्षेत्र, दुनिया का सबसे समृद्ध पिंड क्षेत्र है और कई अन्य देशों को अनुबंधित है, इसलिए यह सबसे अच्छा भ्रम है। भारत के पास मध्य और दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर कटकों पर बहुधात्विक सल्फ़ाइड का अनुबंध भी है।
समुद्रयान प्रकल्प के लिए मत्स्य-6000 पनडुब्बी यान कौन संस्थान विकसित कर रहा है?
- A.भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, बेंगलुरु
- B.राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान, चेन्नई
- C.राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र, गोवा
- D.भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र, हैदराबाद
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व्याख्या
सही उत्तर B, राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान, चेन्नई है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का यह स्वायत्त संस्थान भारत के महासागरीय अभियांत्रिकी उपकरण डिज़ाइन और निर्मित करता है, विलवणीकरण संयंत्रों और लंगर डाले बोयों से लेकर गहरे समुद्र की खनन प्रणालियों तक, और वही मत्स्य-6000 तथा गोतों को सहारा देने वाली प्रणालियाँ विकसित कर रहा है।
विकल्प A, अंतरिक्ष एजेंसी, टाइटेनियम के गोले की वेल्डिंग तथा परीक्षण और प्रक्षेपण श्रेणी की सामग्री पर विशेषज्ञता देती है, इसीलिए यह विश्वसनीय गलत उत्तर है, पर यह यान उसकी परियोजना नहीं है। विकल्प C, गोवा का ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र, ध्रुवीय अभियान और दक्षिणी महासागर कार्यक्रम चलाता है, यान विकास नहीं। विकल्प D, हैदराबाद का महासागर सूचना सेवा केंद्र, महासागरीय परामर्श जारी करता है और सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र चलाता है। इस विषय में चारों निकाय आते हैं, इसलिए हर एक को उसके काम से जोड़ें।
भारत का मानवयुक्त गहन महासागर पनडुब्बी यान मत्स्य-6000 कितने व्यक्तियों को और कितनी गहराई तक ले जाने के लिए बना है?
- A.दो व्यक्ति, 3,000 मीटर तक
- B.तीन व्यक्ति, 6,000 मीटर तक
- C.चार व्यक्ति, 6,000 मीटर तक
- D.तीन व्यक्ति, 11,000 मीटर तक
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व्याख्या
सही उत्तर B, तीन व्यक्ति, 6,000 मीटर तक है। मत्स्य-6000 का नाम छह हज़ार मीटर की डिज़ाइन गहराई से आया है और यह टाइटेनियम के यात्री गोले में तीन लोगों के चालक दल के लिए बना है। एक गोता लगाने पर लगभग बारह घंटे सामान्य संचालन की योजना है, और आपात स्थिति में करीब छियानबे घंटे की सहनशीलता, जिससे बचाव आने तक चालक दल जीवित रह सके।
विकल्प A दोनों आँकड़े कम कर देता है। विकल्प C चालक दल चार कर देता है, जिसके लिए गोला बना ही नहीं है। विकल्प D गहराई ग्यारह हज़ार मीटर कर देता है, जो मेरियाना गर्त में महासागर के सबसे गहरे बिंदु के निकट है; दुनिया में गिने-चुने विशेष यान ही उस गहराई के लिए बने हैं और मत्स्य-6000 उनमें नहीं है। जिस प्रकल्प के तहत यह यान बन रहा है उसका नाम समुद्रयान है, और वह डीप ओशन मिशन का मानवयुक्त घटक है।
डीप ओशन मिशन को 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने किस मंत्रालय के अधीन मंज़ूरी दी?
- A.पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय
- B.विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय
- C.पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय
- D.पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय है। मंत्रिमंडल ने डीप ओशन मिशन को जून 2021 में इसी मंत्रालय को कार्यान्वयन एजेंसी बनाते हुए मंज़ूर किया, और अनुमानित लागत पाँच वर्ष में चरणों में खर्च होने वाले लगभग 4,077 करोड़ रुपये रखी। इसी मंत्रालय के अधीन वे तीन संस्थान हैं जो यह काम करते हैं: गोवा का ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र, चेन्नई का महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान और हैदराबाद का महासागर सूचना सेवा केंद्र।
विकल्प B, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग चलाता है, जिनके अपने कार्यक्रम हैं पर यह मिशन नहीं। विकल्प C, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय, पोत परिवहन तथा बंदरगाह ढाँचे से जुड़ा है, जो नील अर्थव्यवस्था का हिस्सा है पर इस मिशन का नहीं। विकल्प D, पर्यावरण मंत्रालय, वन, वन्यजीव और जलवायु वार्ताओं को सँभालता है। मिशन के छह घटक अलग से सूचीबद्ध करने योग्य हैं, क्योंकि उन पर सुमेलित प्रश्न बनते हैं।