दिसंबर 2021 में प्रक्षेपित जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
- A.यह पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर रहकर सूर्य की परिक्रमा करती है।
- B.यह लगभग 15 लाख किमी दूर रहकर पृथ्वी की परिक्रमा करती है।
- C.यह पृथ्वी से लगभग 10 लाख किमी दूर अंतरिक्ष में स्थिर है।
- D.यह पृथ्वी से लगभग 3-5 लाख किमी दूर चंद्रमा की परिक्रमा करती है।
सही उत्तर
व्याख्या
सही उत्तर है A, यह पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर रहकर सूर्य की परिक्रमा करती है। दूरबीन पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर दूसरे लैग्रेंज बिंदु (L2) के पास है और पृथ्वी के साथ सूर्य का चक्कर लगाती है।
जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन NASA ने यूरोपीय और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ बनाई और इसे 25 दिसंबर 2021 को फ्रेंच गयाना से एरियन 5 रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया। यह मुख्यतः अवरक्त प्रकाश में सबसे पुरानी आकाशगंगाओं, तारों के जन्म और बाह्य ग्रहों के वायुमंडल का अध्ययन करती है। L2 पृथ्वी के उस ओर है जो सूर्य से दूर है; वहाँ सूर्य और पृथ्वी का संयुक्त खिंचाव इसे पृथ्वी की वार्षिक कक्षा के साथ चलाता है। बड़ा सनशील्ड इसके 6.5 मीटर चौड़े सुनहरे दर्पण को बहुत ठंडा रखता है।
B गलत है: यह पृथ्वी की परिक्रमा नहीं करती; L2 पर यह सूर्य के चारों ओर घूमती है।
C गलत है: यह स्थिर नहीं है, और इसकी दूरी लगभग 15 लाख किमी है, 10 लाख किमी नहीं।
D गलत है: यह चंद्रमा की परिक्रमा नहीं करती; चंद्रमा केवल लगभग 3.84 लाख किमी दूर है।
परीक्षा टिप: JWST = 25 दिसंबर 2021 को प्रक्षेपण, अवरक्त दूरबीन, लगभग 15 लाख किमी दूर L2 बिंदु, हबल की उत्तराधिकारी।
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंथेनी जिले में प्रस्तावित भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला का मुख्य संसूचक क्या होगा?
- A.जल चेरेनकोव टंकी
- B.50,000 टन का चुंबकित आयरन कैलोरीमीटर
- C.द्रव आर्गन टाइम प्रोजेक्शन चैंबर
- D.अतिचालक टोकामाक
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, 50,000 टन का चुंबकित आयरन कैलोरीमीटर है, जिसे आईकैल कहा जाता है और जिसे प्रतिरोधी प्लेट चैंबरों से पढ़ा जाएगा। बोदी वेस्ट हिल्स के पोट्टिपुरम में लगभग 1,300 मीटर चट्टान के नीचे बनी गुफा में रखा जाने वाला यह संसूचक वायुमंडलीय न्यूट्रिनो पकड़ने और यह मापने के लिए बना है कि वे एक प्रकार से दूसरे प्रकार में कैसे बदलते हैं, अर्थात न्यूट्रिनो दोलन; चुंबकीय क्षेत्र के कारण यह न्यूट्रिनो और प्रतिन्यूट्रिनो में अंतर बता सकता है। विकल्प A, जल चेरेनकोव टंकी, जापान के सुपर-कामिओकांडे का डिजाइन है, आईकैल का नहीं। विकल्प C, द्रव आर्गन टाइम प्रोजेक्शन चैंबर, अमेरिकी ड्यून प्रयोग की तकनीक है। विकल्प D, अतिचालक टोकामाक, भारत के एसएसटी-1 जैसी संलयन मशीन है और न्यूट्रिनो से उसका कोई संबंध नहीं है। वेधशाला का आतिथेय संस्थान टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान है, और भारत ने 1965 में कोलार स्वर्ण क्षेत्र की खदानों में वायुमंडलीय न्यूट्रिनो दर्ज कर लिए थे।
लाइगो नेटवर्क का तीसरा संसूचक लाइगो-इंडिया किस स्थान पर स्थापित किया जा रहा है?
- A.औंढा, हिंगोली जिला, महाराष्ट्र
- B.हानले, लद्दाख
- C.पोट्टिपुरम, थेनी जिला, तमिलनाडु
- D.खोडद, पुणे जिला, महाराष्ट्र
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, महाराष्ट्र के हिंगोली जिले का औंढा है। यह स्थल समतल और भूकंपीय दृष्टि से शांत भूमि के कारण चुना गया, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने परियोजना को 2016 में सैद्धांतिक तथा अप्रैल 2023 में पूर्ण स्वीकृति दी, और इसे परमाणु ऊर्जा विभाग तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, इंदौर के आरआरकैट और पुणे के आईयूकैक के साथ बना रहे हैं। विकल्प B, लद्दाख का हानले, खगोल विज्ञान का स्थल है, जहां भारतीय खगोलीय वेधशाला और मेस गामा किरण दूरबीन हैं। विकल्प C, थेनी जिले का पोट्टिपुरम, भारत आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला का प्रस्तावित स्थल है, जो भिन्न मेगा विज्ञान परियोजना है। विकल्प D, पुणे के निकट खोडद, जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप का स्थान है। जोड़ियां अलग रखें: गुरुत्वीय तरंगें हिंगोली में, न्यूट्रिनो थेनी में, रेडियो खगोल विज्ञान खोडद में और प्रकाशिक खगोल विज्ञान हानले में।
सितंबर 2015 में लाइगो द्वारा पहली बार संसूचित गुरुत्वीय तरंगों की भविष्यवाणी एक शताब्दी पूर्व किसने की थी?
- A.आइजैक न्यूटन
- B.अल्बर्ट आइंस्टीन
- C.नील्स बोर
- D.स्टीफन हॉकिंग
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर B, अल्बर्ट आइंस्टीन है। गुरुत्वीय तरंगें दिक्काल में उठने वाली लहरें हैं, जो दो कृष्ण विवरों के विलय जैसी प्रचंड घटनाओं से निकलती हैं, और ये उस सामान्य सापेक्षता सिद्धांत से निकलती हैं जिसे आइंस्टीन ने 1915 में प्रकाशित किया तथा तरंगों की भविष्यवाणी 1916 में रखी। लाइगो ने पहला सीधा संकेत 14 सितंबर 2015 को दर्ज किया और फरवरी 2016 में उसकी घोषणा की, तथा 2017 का भौतिकी नोबेल रेनर वाइस, बैरी बैरिश और किप थॉर्न को मिला। विकल्प A, आइजैक न्यूटन, ने गुरुत्वाकर्षण का व्युत्क्रम वर्ग नियम दिया, जिसमें गुरुत्व तत्क्षण कार्य करता है और तरंगों का कोई स्थान नहीं है। विकल्प C, नील्स बोर, ने परमाणु और क्वांटम सिद्धांत पर कार्य किया। विकल्प D, स्टीफन हॉकिंग, कृष्ण विवर विकिरण और ब्रह्मांड विज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं, इसीलिए उनका नाम भ्रमित करता है, परंतु उनका जन्म इस भविष्यवाणी के बहुत बाद हुआ।
नाभिकीय संलयन अभिक्रिया के दौरान -
- A.तापीय न्यूट्रॉनों की बमबारी से एक हल्का नाभिक टूट जाता है।
- B.तापीय न्यूट्रॉनों की बमबारी से एक भारी नाभिक टूट जाता है।
- C.दो हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक और संभवतः अन्य उत्पाद देते हैं।
- D.एक भारी नाभिक स्वयं दो टुकड़ों में टूट जाता है।
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर C है। संलयन दो हल्के नाभिकों का जुड़कर भारी नाभिक बनना है, जिसमें न्यूट्रॉन या अन्य उत्पाद निकलते हैं और बहुत अधिक ऊर्जा प्रकट होती है, क्योंकि उत्पाद का द्रव्यमान अभिकारकों के द्रव्यमान से कुछ कम होता है; आईटीईआर में यह अभिक्रिया ड्यूटीरियम और ट्राइटियम को जोड़कर हीलियम तथा एक न्यूट्रॉन देती है। विकल्प A गलत है, क्योंकि तापीय न्यूट्रॉन से टकराने पर हल्का नाभिक उपयोगी रूप से नहीं टूटता; मंद न्यूट्रॉन से प्रेरित विखंडन भारी विखंडनीय नाभिकों पर होता है। विकल्प B नाभिकीय विखंडन का वर्णन करता है, अर्थात तापीय न्यूट्रॉनों द्वारा यूरेनियम-235 जैसे भारी नाभिक का टूटना, जो संलयन का उलटा है। विकल्प D स्वतः विखंडन बताता है, जिसमें अत्यंत भारी नाभिक बिना टकराव स्वयं विभाजित हो जाता है और जो रेडियोसक्रिय क्षय का एक रूप है। संलयन के लिए दो नाभिकों के विद्युत प्रतिकर्षण को पार करने हेतु अपार ताप और दबाव चाहिए, इसीलिए टोकामाक प्लाज्मा को चुंबकीय क्षेत्रों से बांधता है।
हाइड्रोजन बम किस नाभिकीय प्रक्रिया पर आधारित है?
- A.तापीय संलयन
- B.भारी जल क्षमता
- C.तापीय विखंडन
- D.त्वरित प्रजनक अभिक्रिया
उत्तर देखें
व्याख्या
सही उत्तर A, तापीय संलयन है। हाइड्रोजन बम, जिसे तापनाभिकीय बम भी कहा जाता है, विखंडन विस्फोट का उपयोग केवल उद्दीपक के रूप में करता है; मुख्य ऊर्जा लाखों डिग्री ताप पर हाइड्रोजन के भारी समस्थानिकों ड्यूटीरियम और ट्राइटियम के हीलियम में संलयन से मिलती है, इसलिए इस प्रक्रिया को तापनाभिकीय या तापीय संलयन कहा जाता है। यही अभिक्रिया सूर्य को ऊर्जा देती है और इसी को शांतिपूर्ण ऊर्जा के लिए साधने हेतु आईटीईआर बनाया जा रहा है। विकल्प B, भारी जल क्षमता, कोई नाभिकीय प्रक्रिया ही नहीं है; भारी जल भारतीय दबावित भारी जल रिएक्टरों में मंदक और शीतलक के रूप में काम आता है। विकल्प C, तापीय विखंडन, मंद न्यूट्रॉनों द्वारा यूरेनियम-235 जैसे भारी नाभिक का टूटना है और यह परमाणु बम तथा साधारण परमाणु बिजलीघरों की प्रक्रिया है। विकल्प D, प्रजनक अभिक्रिया, वह विखंडन है जिसमें खपत से अधिक विखंडनीय पदार्थ बनता है, जैसे प्रजनक रिएक्टर में।