अपपर्णन, जिसमें ग्रेनाइट गुंबद से चट्टान की वक्र परतें प्याज के छिलके की तरह उतरती हैं, किस प्रक्रिया का उदाहरण है?
- A.रासायनिक अपक्षय
- B.भौतिक अपक्षय
- C.हिमनद अपरदन
- D.पवन निक्षेपण
सही उत्तर
B. भौतिक अपक्षय
व्याख्या
सही उत्तर B, भौतिक अपक्षय है। अपपर्णन चट्टान की बाहरी परत के बार बार गर्म और ठंडा होने तथा ऊपर के पदार्थ के हटने पर दबाव मुक्त होने से होता है; सतह भीतरी भाग की अपेक्षा अधिक फैलती और सिकुड़ती है और वक्र चादरों के रूप में अलग हो जाती है। इसमें चट्टान की रासायनिक संरचना नहीं बदलती और कोई परिवहन नहीं होता, अतः यह अपने स्थान पर होने वाला यांत्रिक अपक्षय है। विकल्प A, रासायनिक अपक्षय, के लिए कार्बोनेटीकरण, जल अपघटन या ऑक्सीकरण जैसी अभिक्रियाएँ आवश्यक हैं जो खनिजों को ही बदल देती हैं, जैसे चूना पत्थर का घोलन। विकल्प C, हिमनद अपरदन, में चलती हिम चट्टान को उखाड़ती और घिसती है तथा सर्क और यू आकार की घाटियाँ बनाती है, प्याज जैसी परतें नहीं। विकल्प D, पवन निक्षेपण, बालुका स्तूप और लोएस बनाता है और निक्षेपण की प्रक्रिया है, जो चट्टान तोड़ने के विपरीत है। इस अध्याय के अधिकांश प्रश्नों का निर्णायक नियम स्मरण रखें: अपक्षय चट्टान को उसी स्थान पर तोड़ता है, अपरदन टुकड़ों को हटाकर ले जाता है।
पूरा लेख पढ़ें: स्थलरूप, अपक्षय और अपरदन: नोट्स और प्रश्न
अभ्यास प्रश्न
सभी देखेंनिम्नलिखित में से कौन 'उत्खात भूमि' का मुख्य कारण है?
- A.अल्प वर्षा
- B.मृदा अपरदन
- C.अत्यधिक वन आवरण
- D.खुले में शौच
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. मृदा अपरदन
व्याख्या
सही उत्तर B, मृदा अपरदन है। उत्खात भूमि वह भू भाग है जो गहरी अवनालिकाओं और तीखे कटकों के घने जाल में कट जाता है और इतना विच्छेदित हो जाता है कि खेती असंभव हो जाती है। यह तब बनती है जब बहता जल ऊपरी मृदा को परत प्रवाह के रूप में हटाता है और वह प्रवाह पहले सँकरी सरिताओं में तथा फिर अवनालिकाओं में केंद्रित हो जाता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की चंबल अवनालिकाएँ भारत का पाठ्यपुस्तक उदाहरण हैं। विकल्प A, अल्प वर्षा, गलत है क्योंकि उत्खात भूमि के लिए ढीले पदार्थ पर तीव्र और केंद्रित जल प्रवाह आवश्यक है और वह अत्यंत शुष्क भागों की अपेक्षा भारी मौसमी वर्षा वाले क्षेत्रों में बनती है। विकल्प C, अत्यधिक वन आवरण, सत्य के विपरीत है, क्योंकि जड़ों और पत्तियों का घना आवरण मृदा को बाँधता है और वर्षा बूँदों का वेग तोड़ता है। विकल्प D, खुले में शौच, स्वच्छता की समस्या है और अवनालिका निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं है। यही प्रश्न कभी अवनालिका शब्द के साथ भी पूछा जाता है और उत्तर वही रहता है।
निम्नलिखित में से कौन मृदा संरक्षण की विधि नहीं है?
- A.अंतरवर्तीय फसल
- B.रक्षक मेखला
- C.शिला बाँध
- D.अतिचारण
उत्तर देखें
सही उत्तर: D. अतिचारण
व्याख्या
सही उत्तर D, अतिचारण है। अतिचारण घास का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त कर देता है, पशुओं के खुर सतह को ढीला कर देते हैं और नंगी मृदा वर्षा तथा पवन के सम्मुख खुल जाती है, अतः यह शुष्क भारत में मृदा अपरदन के प्रमुख कारणों में है, उपाय कदापि नहीं। विकल्प A, अंतरवर्तीय फसल, में दो या अधिक फसलें एकांतर पंक्तियों में उगाई जाती हैं जिससे भूमि कभी नंगी नहीं रहती और गिरती वर्षा का वेग घट जाता है; यह मान्य संरक्षण पद्धति है। विकल्प B, रक्षक मेखला, प्रचलित पवन के आड़े लगाई गई वृक्षों की पंक्तियाँ हैं, जिनका उपयोग राजस्थान तथा तटीय भागों में पवन की गति घटाने और बालू मृदा के अपवाहन को रोकने के लिए होता है। विकल्प C, शिला बाँध, अवनालिका के आड़े बनाया गया पत्थरों का नीचा अवरोध है जिससे जल धीमा होकर गाद गिरा देता है और वाहिका को और गहरा नहीं काटता। ऐसे प्रश्नों में तीन वास्तविक उपाय और एक क्षरण कारण दिया जाता है, अतः प्रश्न में नहीं शब्द अवश्य पढ़ें।
अपरदन के निम्नलिखित प्रकारों को खेत से होने वाली मृदा हानि के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए: I. अवनालिका अपरदन II. उच्छाल अपरदन III. सरिता अपरदन IV. परत अपरदन। नीचे दिए कूट से सही उत्तर चुनिए।
- A.IV, I, III, II
- B.II, IV, III, I
- C.III, II, I, IV
- D.II, III, IV, I
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. II, IV, III, I
व्याख्या
सही उत्तर B, अर्थात II, IV, III और I है। जल अपरदन चरणों में आगे बढ़ता है और प्रत्येक चरण पर मृदा की हानि बढ़ती जाती है। उच्छाल अपरदन, जो क्रमांक II है, प्रथम और सबसे मंद है: वर्षा की बूँदें नंगी मृदा पर गिरकर अलग अलग कणों को कुछ सेंटीमीटर दूर उछाल देती हैं। परत अपरदन, जो क्रमांक IV है, इसके पश्चात आता है, जब विस्थापित पदार्थ संपूर्ण सतह पर जल की पतली चादर के रूप में बह जाता है। सरिता अपरदन, जो क्रमांक III है, तब आरंभ होता है जब वही प्रवाह कुछ सेंटीमीटर गहरी छोटी वाहिकाओं में एकत्र हो जाता है, जिन्हें हल चलाकर मिटाया जा सकता है। अवनालिका अपरदन, जो क्रमांक I है, अंतिम और सर्वाधिक विनाशकारी चरण है, जिसमें वे वाहिकाएँ गहरी होकर स्थायी खड्ड बन जाती हैं और खेत अनुपयोगी हो जाता है। अतः बढ़ता क्रम उच्छाल, परत, सरिता और अवनालिका है, जो विकल्प B है। विकल्प A तथा C उच्छाल से पहले अवनालिका या सरिता रखते हैं और विकल्प D परत से पहले सरिता रखता है, अतः कोई भी मान्य क्रम से मेल नहीं खाता।
चूना पत्थर की गुफा के भीतर आश्मलंब, आश्मस्तूप और स्तंभ मुख्यतः किस कारक की क्रिया से बनते हैं?
- A.पवन
- B.हिमनद
- C.भूमिगत जल
- D.सागरीय तरंगें
उत्तर देखें
सही उत्तर: C. भूमिगत जल
व्याख्या
सही उत्तर C, भूमिगत जल है। कार्बन डाइऑक्साइड युक्त वर्षा जल दुर्बल कार्बोनिक अम्ल बन जाता है, चूना पत्थर की संधियों में रिसता है और कार्बोनेटीकरण द्वारा कैल्सियम कार्बोनेट को घोल देता है। कंदरा के भीतर टपकता जल कार्बन डाइऑक्साइड खो देता है और उसी कैल्सियम कार्बोनेट को फिर जमा कर देता है, जिससे छत से नीचे की ओर आश्मलंब, फर्श से ऊपर की ओर आश्मस्तूप और दोनों के मिलने पर स्तंभ बनता है। इन सभी लक्षणों का कुल कार्स्ट स्थलाकृति कहलाता है। विकल्प A, पवन, छत्रक शिला, यारडांग, बालुका स्तूप और लोएस बनाती है, वह भी नंगी सतह वाले शुष्क प्रदेशों में। विकल्प B, हिमनद, सर्क, कंगीय कटक, गिरिशृंग और यू आकार की घाटियाँ काटता है तथा हिमोढ़ और ड्रमलिन जमा करता है। विकल्प D, सागरीय तरंगें, तट पर भृगु, गुफाएँ, मेहराब और स्टैक काटती हैं तथा पुलिन, रोधिका और लैगून बनाती हैं। भारत में आंध्र प्रदेश की बोर्रा गुफाएँ इसका प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
गोखुर झील निम्नलिखित में से किसके द्वारा बनती है?
- A.हिमनद द्वारा गर्त खोदना
- B.विसर्पी नदी द्वारा लूप का कट जाना
- C.मरुस्थल में पवन अपवाहन
- D.क्रेटर का ज्वालामुखीय अवतलन
उत्तर देखें
सही उत्तर: B. विसर्पी नदी द्वारा लूप का कट जाना
व्याख्या
सही उत्तर B, विसर्पी नदी द्वारा लूप का कट जाना है। नदी अपने मध्य और निचले भाग में एक ओर से दूसरी ओर झूलती है, प्रत्येक मोड़ के बाहरी किनारे का अपरदन करती है और भीतरी किनारे पर निक्षेपण करती है। लूप की गर्दन क्रमशः सँकरी होती जाती है और कोई बाढ़ उसे सीधे काट देती है; छोड़ा हुआ लूप गाद से बंद होकर अर्धचंद्राकार झील के रूप में बचा रहता है, जिसे गोखुर झील कहते हैं। विकल्प A सर्क अथवा टार्न का वर्णन है, जो ऊँचे पर्वतों के हिमनद गर्त हैं और वृत्ताकार होते हैं, अर्धचंद्राकार नहीं। विकल्प C, पवन अपवाहन, मरुस्थलों में छिछले बेसिन खोदता है जिनमें जल थोड़े समय ही रहता है और वे लूप के आकार के नहीं होते। विकल्प D क्रेटर झील का वर्णन है, जैसे महाराष्ट्र की लोणार झील, जिसका नदी के मोड़ों से कोई संबंध नहीं है। परीक्षक इसके साथ यह तथ्य भी जोड़ते हैं कि गोखुर झीलें गंगा और ब्रह्मपुत्र के बाढ़ के मैदानों में सामान्य हैं।